रास्ता निहारूँ
रास्ता निहारूँ
कर के साज शृंगार
रास्ता निहारूँ उनका
कब आयेंगे साजन मेरे
प्रीत के दरबार मे आयेंगे
पहनाऊँगी बाँहों का हार
मन में बसा के प्यारी सी छवि
मिल के साजन को बता दूँ
अब ना आये करार तुम्हारे बिना
यादों ने तुम्हारी खिला रंग चेहरे का
बेसुध बने हम दोनों प्यार में
सोलह शृंगार करूँ मैं
पुकारूँ कैसे उन्हें
जाग न जाये जग सारा
सोच रही तुम्हारी सजनी।
