STORYMIRROR

Rupali Tapkire

Inspirational

4  

Rupali Tapkire

Inspirational

बिखरती हुं

बिखरती हुं

2 mins
12

रोज टूटती हूं, बिखरती हूं

पर अगले दिन फिर वही मुस्कान लिए संवर जाती हूं 

दिन भर इसी उठापटक में निकल जाता ही के कहीं किसी के लिए कुछ कमी ना रह जाए 


दिन भर खटती रहती हूं चकरघिनी सी घूमती हूं 

घड़ी की सुइयों की तरह बस भागती ही रहती हूं

थक हार कर रात को बिस्तर पर जब जाती हूं तब भी सुबह की चिंता में लगी रहती है 

किसके लिए क्या बनाना है 

किसको क्या देना है 

कहीं देर ना हो जाए इसलिए समय पर उठना भी जरूरी है 


जाने कैसे चूक गई आज उठने में 

आंख देर तक लग गई 

तानों की सौगात मिल गई 


हर वक्त कोशिश की सबसे रिश्ता निभाने की 

पर रिश्तों ने कब मेरा साथ निभाया 

जरूरत पर बस खुद को अकेला ही पाया

तुम्हारे मां बाप भाई बहन सबको अपना समझा पर समय समय पर सबने दगा दिया 


उसके बाद भी मेरे घरवालों को तुमने बस गाली ही दी 

जब मैंने तुम्हारे अपनो को अपना माना तो तुमने क्यों नही माना

मैं अगर बहु बनी तो तुम भी दामाद बने 

बहु के सारे फर्ज़ और दामाद का कोई फर्ज़ नही 


जब थक गई रिश्तों को निभाते तो छोड़ दिया मैने उनका साथ पर तुमने क्या किया 

बदले में मुझे ही छोड़ दिया 

मां बाप तुम्हारे 

भाई बहन तुम्हारे 

और बीवी वो ना तुम्हारी ना तुम्हारे घरवालों की 

जिसका जैसा मन किया वैसा व्यवहार किया 

फिर मेरा ही व्यवहार क्यों बुरा हो गया 


सोचती हूं आखिर क्या पाया मैंने एक औरत हो कर 

त्याग भी आखिर कितना 

कुछ ज्यादा तो कभी मांगा ही नही 

बस हर कदम पर तुम्हारा साथ थोड़ा प्यार और थोड़ा सम्मान 

जब मैं इतना करती हूं तो क्या बदले में कुछ पाने का हक नहीं रखती 


आखिर क्यों और कब तक सहूंगी मैं 

कब तक रिश्तों के नाम पर छली जाऊंगी मै।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational