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Tarun Anand

Abstract


4.8  

Tarun Anand

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प्रकृति का संदेश

प्रकृति का संदेश

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पूरी पृथ्वी स्थिर है, क्या अजीब मंजर है,

प्रकृति भी पूरे रौ में चुभो रही खंजर है।

कैसा यह विनाश का हो रहा तांडव है,

रास्ते वीरान, पशु-पक्षी हैरान, जमीन भी अब बंजर है।


आज सब कैद हैं अपने ही बनाए मकानों में,

कितनी महँगी है ज़िंदगी, यह मिलती नहीं दुकानों में।

ये कैसी छाई वीरानी है और कैसी है ये मदहोशी,

सबके चेहरे सुर्ख है और पसरी है अजीब सी खामोशी।


कल तक सारे लोग जो मौज में थे,

पता नहीं ! क्यों आज वही सब खौफ में है।

क्या शूल बनके चुभ रही है हवा,

या प्रकृति दे रही है हम सभी को सजा।


समस्त मानव जाति है तबाह और परेशान,

आज सबकी पड़ गयी है संकट में जान।

जितनी निर्ममता से किया था दोहन प्रकृति का,

उतनी ही जल्दी संदेशा आया विपत्ति का।


यही तो वक़्त है संभलने का,

कदम मिला कर प्रकृति संग चलने का।

शांत बैठो, धैर्य रखो, बिगड़े को सुधरने दो,

वक़्त दो, साथ दो, प्रकृति को फिर से सँवरने दो।


हरियाली का मान रखो, स्वयं को इंसान बना डालो,

स्वच्छता का हाथ थाम, बीमारी को मिटा डालो ।

होगी सतर्कता, सामंजस्य की नयी दृष्टि,

तभी खुशी के गीत फिर से गाएगी प्रकृति।


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