पहचान
पहचान
हमने जन्म लिया
समझा, अब ये जीवन है सिर्फ मेरा
पर धीरे-धीरे ज्ञात हुआ
ये जीवन सिर्फ नहीं मेरा, ये तो है हमारा।
ढूँढा बहुत अपने आप को ?
ये बेटी, बहू, पत्नी, माँ इन रिश्तों से है जुड़ा
ये सवाल अब भी है खड़ा ?
इस उत्तर को ढूँढा हमने हर घड़ी
हर बार प्रश्न ? प्रश्न बनकर ही रहा ?
जनम मेरा; पर पहचान मेरी कोई और बना
रिश्तों के नाम से, उसका रूप निखरा।
इन रिश्तों की प्यार भरी डोर ने
मेरा जीवन हर किसी का बन गया
अपने-आप को ढूँढते-ढूँढ़ते उस राह पर आ गए
न जीते बनेगा; न मरते बनेगा।
'जीवन ' जो मैं 'जी ' भी नहीं
उसे 'कर्म ' का फल कहकर जीना पड़ा
आखिर 'दिल' और 'जिंदगी' ने मान लिया
जीवन 'मैं ' नहीं; 'मैं' जीवन के लिए बना
'मैं' जीवन के लिए बना।
