STORYMIRROR

Sudhir Srivastava

Abstract

4  

Sudhir Srivastava

Abstract

पौत्र

पौत्र

1 min
387

पुत्र का पुत्र पौत्र

जिसमें दिखे दादा को

अपना बचपन।

एक अजीब सी मस्ती

छा जाती है दादा के चेहरे पर,

दादा का दर्द जैसे

काफी कम हो जाता है उस पल

जब पौत्र होता दादा के संग।


पौत्र को भी मिल जाती है जैसे

हुड़दंग की आजादी,

मम्मी पापा का डर नहीं होता

दादा की छत्रछाया में

भला डांटने मारने का हौसला किसे होता।


हर जिद दादा से पूरी होती

पौत्र दादा के जीवन की

सांध्य बेला में लाठी होती।

जीवन खुशहाली से बीत जाता

बड़ा सौभाग्य समझता है वो दादा

जो पौत्र के कंधे पर श्मशान जाता।


दादा और पौत्र का होता ऐसा नाता

उम्र का लंबा फासला भले होता

मगर इनके बीच होता है गहरा नाता। 


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract