दोहा
दोहा
धर्म-धुरंधर लोग कुछ, बाँट रहे ज्ञान। आता-जाता कुछ नहीं, केवल चर्चा जान।। अपने-अपने धर्म का, सभी करें सम्मान। इससे आपस में बढ़े, भाईचारा ज्ञान।। किसके मन में क्या छिपा, कौन रहा है जान। सफल नहीं अब तक हुआ, मानव का विज्ञान।। क्या मन में किसके छिपा, खोजें हम सब आज। कोशिश में विज्ञान भी, कैसे पाए राज।। किसके मन में क्या छिपा, प्रश्न बड़ा गंभीर। इस रहस्य की खोज में, मानव बड़ा अधीर।। ईश्वर भी बेचैन है, हुई कौन सी भूल। किसके मन में क्या छिपा, चुभी हमें जो शूल।। किसके मन में क्या छिपा, कैसे कह दें राम। शरण बैठकर भक्त ने, किया नाम बदनाम।। सड़कें बन नदियां सभी, बहे शहर में धार। छतरी वाला तैरता, करे समय बेकार।। बस पानी में है खड़ी, बाइक हुई अधीर। डूबी दिखती कार है, जन-मानस में पीर।।` नफ़रत के बाजार में, सभी उठाते मौज। जैसे बोरिंग चल रही, नहा रहे हैं हौज।। जितना चाहें दीजिए, चल जाएगा काम। यदि इच्छा बिल्कुल नहीं, मत होना बदनाम।। समझ नहीं क्यों आ रहा, उसके मन का भेद। फिर भी हम जतला रहे, कान पकड़कर खेद।। आज दिखावा खूब है, कटे नाक या कान। चमचे शोर मचा रहे, बेचारा कुर्बान।। मन दर्पण निर्मल रखो, करते रहना साफ। ईश्वर भी तब आपकी, भूल करेगा माफ़।। निर्मल नदिया सी बहे, रिश्तों की रस धार। जहर दिखावे का भरा, बन जाता है भार।। पालक भी कुछ हो रहे, आज बड़े हैवान। पानी पीकर कोसते, कलयुग के शैतान।। पालक भी तो बन रहे, तरह-तरह के लोग। उनमें कुछ भगवान जस, कुछ देते बस रोग।। मातु-पिता ईश्वर सदा, सच्चे पालक आप। शुभचिंतक सबसे बड़े, ढाल शोक-संताप।। मन थाली को देखकर, सुखदा भोजन सार। दाल-रोटी चावल संग, भिंडी का त्योहार।। खीरा अचार रायता, संग इमरती जान। सादा भोजन ही सदा, तृप्ति सहज पहचान।। जो हो भोजन सामने, सदा करो सम्मान। मातु अन्नपूर्णा कृपा, सुंदर स्वस्थ सुजान।। मंदिर मस्जिद चर्च में, भेष बदलकर लोग। नेता केवल चाहते, वोट मिलन संयोग।। मंदिर मस्जिद चर्च सब, हैं ईश्वर के धाम। कुछ उन्मादी सोचते, दूजा हो बदनाम।। मंदिर में हो आरती, चर्च प्रार्थना गान। मस्जिद नित्य अजान हो, सूत्रधार इंसान।। मंदिर में सुख- शाँति की, मस्जिद भी दे सीख। करुणा बरसे चर्च में, क्यों हम चाहें भीख।। झूठ और पाखंड का, फैल रहा जाल। इसकी आड़ में हो रहा, जाता रचा बवाल।। मोहन से कुछ सीखिए, प्रेम जगत आधार। होना जीवन में अगर, भव बाधा से पार।। बजती मोहन बाँसुरी, मीठी मधुरिम तान। सम्मोहन में बँध सभी, भूल गए निज गान।। तीखा खाना स्वास्थ्य को, पहुँचाता नुकसान। सादा भोजन दे सदा, जीवन को मुस्कान।। फीका तो अब हो गया, लोगों का व्यवहार। जैसे अब संबंध भी, चलते जस व्यापार।। बहुरंगी पकवान भी, देते नहीं सुकून। लगता जैसे पढ़ रहे, खाने का मजमून।। पकवानों में अब नहीं, पहले वाला स्वाद। भोजन होता सामने, मैया आती याद।। दान चढ़ावा का नया, आया कैसा दौर।। चोरी का है राज क्या, सभी कीजिए गौर।। ऐसा वैसा कुछ नहीं, रहो धीर गंभीर। जब भी हो मुश्किल घड़ी, बनिए मित्र सुधीर।। पूर्व कर्म का फल मिले, निश्चित है यह लेख। भले नहीं हम पा रहे, लें पहले से देख।। कुछ करने से पूर्व यदि, कर लें सोच विचार। फिर क्यों नाहक कष्ट का, सहना होगा सार।। नाहक कुछ बदनाम हैं, वाहन चालक आज। क्या वे सब अंजान हैं, कैसा जीवन साज।। चालक सबसे है बड़ा, एक मात्र भगवान। चाहे जितना शीर्ष पर, पहुँचा हो विज्ञान।। वाहन चालक कब चाहते, दुर्घटना का दोष। फिर भी सहना पड़ रहा, जब-तब उनको रोष।। मन क्यों आज उदास है, मित्र बताओ राज। नहीं समझ में आ रहा, बिगड़ा है क्यों साज।। महका सा ये मन लगे, पर है बहुत उदास। तनिक नहीं भाता उसे, तनिक हास परिहास।। बहका क्यों अब जा रहा, आज मनुजता भाव। सहना भी है पड़ रहा, बिना जख्म का घाव।। शब्द थके पर बोलना, यह कैसा है द्वंद्व। इसके पीछे क्या भला, छिपा हुआ छलछंद।। तुमको रहा न याद अब, दादी नानी गोद। कलयुग का यह रंग है, चाहे जितना खोद।। मात-पिता के कष्ट का, तुमको रहा न याद। अपने हाथों स्वयं, अब भविष्य बर्बाद।। मातु-पिता का अंश हो, रहा न तुमको याद। फिर भी तुम हो चाहते, निज जीवन आबाद।। रहा न तुमको याद अब, गाँव गली अरु खेत। कहें मित्र यमराज जी, समय अभी है चेत।। कहते हैं यमराज जी, रहा न तुमको याद। पर आयेगा एक दिन, जब होंगे बर्बाद।। ********* झूठ और पाखण्ड ********* झूठ और पाखण्ड का, होता नित नव खेल। पढ़ें लिखे भी बन रहे, इस माया की रेल।। तिलक कलावा संग में, कंठी भी बदनाम। झूठ और पाखंड का, ऐसा झाम तमाम।। डरते बिल्कुल हैं नहीं, कलयुग के शैतान। झूठ और पाखंड के, गाते अपने गान।। झूठ और पाखण्ड से, कर बेटी गुमराह।। भोले बन राक्षस जो, करते नित्य गुनाह।। झूठ और पाखंड का, भारी पड़ता खेल। नीति नियम सिद्धांत से, झूठा इसका मेल।। धर्म आड़ में ये करें, भरे नीचता काम। झूठ और पाखण्ड का, इनको मिलता दाम।। ******* शहीद ******** जो शहीद सैनिक हुए, रहें हमेशा याद। श्रद्धा के दो पुष्प से, शौर्य की हम दें दाद।। सैनिक हुए शहीद जो, रहे अमर अभिमान। उनको है इस देश का, यही बड़ा अवदान।। हंसते हंसते कर दिया, प्राणों का बलिदान। धरती माँ की गोद में, सोये चादर तान।। नाम शहीद के हो सदा, गाँव का जो स्कूल। भूलेगा कोई नहीं, निज बगिया के फूल।। हो शहीद के नाम पर, स्कूल औ अस्पताल। मान सभी का बढ़ेगा, अमर रहेगा लाल।। ****** गलत ****** गलत सही जो गलत है, कैसे कह दें यार। लाभ-हानि के बिना, करें नहीं क्षतकरार।। गलत आज जो नित करें, वे देतेज्ञ उपदेश। उनकी कुछ मजबूरियाँ, कुछ उनका परिवेश।। हम डंके की चोट पर, करते सारे काम। गलत-सही को छोड़कर, बस होतै बदनाम।। चंदा चोरी थी गलत, कहते हैं हम लोग। पर कब सोचा आपने, यह भी है इक रोग।। जितना भी होता गलत, सबका एक ही सार। केवल इतनी चाह है, हो अपना विस्तार।। झूठा जो भी तथ्य हो, खंडन कर पुरजोर। वरना मुश्किल आयेगी, दुनिया में तब शोर।। महिमा -मंडन हो गया, जैसे अब उत्पाद। अपने हित सब भेंट में, देते माला लाद।। माँग रहे संसार से, तुम नाहक में भीख। दाता केवल एक है, मानो मेरी सीख।। वाणी से हैं उगलते, आज मनुज अंगार। झुलसा जाता धरा का, मानवता का सार।। ******* सबूत ******* चोरी हमने है किया, दे दो एक सबूत। नाहक ही तुम मत बनो, हरिश्चंद्र के पूत।। चंदा चोरी के नये, मिलते रोज सबूत। फिर भी कहते स्वयं को, बड़ा राम का दूत।। चाह रहे यदि आप हो, हमसे एक सबूत। तो फिर तुम जाकर मिलो, जो है मेरा भूत।। जिंदा होने का भला, क्यों माँगते सबूत। समझ रहे क्या तुम मुझे, हूँ कोई अवधूत।। मम प्रिय वर यमराज से, मिलिए जाकर आप। फिर सबूत को भूलकर, करना मेरा जाप।। ****** विधि का अजब विधान ******* समझ नहीं हम पा रहे, विधि का अजब विधान। इसीलिए क्या मानते, है कोई भगवान।। हिलता पत्ता एक भी, समझो ईश विधान। मत कहना विज्ञान के, उन्नति का अवदान।। विधि का अजब विधान है, मत ढ़ूंढ़ो तुम तोड़। नहीं मिलेगा आपको, अपनी इच्छा मोड़।। पल-पल जो है हो रहा, वारिश वर्षा धूप। विधि का अजब विधान का, निश्चित है प्रारुप।। मान रहे यमराज भी, विधि का अजब विधान। इसीलिए वो बाँटते, नहीं व्यर्थ का ज्ञान।। विधि के अजब विधान से, टकराना है व्यर्थ। कोशिश जिसने भी किया, प्रतिफल मिला अनर्थ।। ****** बालक ****** बालक भी अब स्वयं को, कब माने नादान। सेवा और सद्ज्ञान को, नहीं मानते ज्ञान।। बालक भी देने लगे, मातु-पिता को ज्ञान। हमें बोध होने लगा, कलयुग नया विधान।। बालक बनकर जो रहे, देते बड़ों को मान। ईश्वर की संग में कृपा, सबका उन पर ध्यान।। बालक बन रहना मुझे, देता खुशी अपार। छाया बड़ों की शीश पर, मम जीवन आधार।। समय साथ होना बड़ा, ईश्वर का वरदान। बालक का सौभाग्य है, क्यों करना अभिमान।। ******* फिजूल ********* खर्चा फिजूल का जो करे, संग खूब अभिमान। आता ऐसा एक दिन, जब इसका संज्ञान।। समय नहीं फिजूल का, आप करो बरबाद। लौट नहीं आये कभी, व्यर्थ सभी फरियाद।। अगर सरल फिजूल का, मुझसे मिलिए आप। काम हमारा कीजिए, कर सुधीर का जाप।। समझ रहे जीवन अगर, अपना आप फिजूल। मिलो मित्र यमराज से, बाँट रहे वो फूल।। आवेदन हैं माँगते, जितने धरा फिजूल। मुफ्त मिलेगी नौकरी, फाँक सके जो धूल।। ******** दिन दिन बढ़ता जा रहा ********* दिन दिन बढ़ता जा रहा, अब ऐसा संबंध। ऐसा लगता अब हमें, बस केवल अनुबंध।। कब सोते कब जागते, भूले हम अनुराग।। दिन-दिन बढ़ता जा रहा, सबका भागमभाग। दिन-दिन बढ़ता जा रहा, आज धरा व्यभिचार। कैसा होता जा रहा अपना यह संसार।। दिन-दिन बढ़ता जा रहा, रोज-रोज नव रोग। रहन-सहन है बिगड़ गया, निज करनी सब भोग।। बढ़ता जाता है जहर, नहीं किसी की खैर।। दिन-दिन बढ़ता जा रहा, आपस में ही बैर।। दिन दिन बढ़ता जा रहा, धरा प्रदूषण भार। क्या धरती पर शेष है, ये ही जीवन स।। स
