मुक्तक
मुक्तक
दोहा मुक्तक ******* दोषारोपण से भला, मिले कौन सा ताज। दुनिया को बतलाइए, जो भी इसका राज। नाहक देते दिल दुखा, निज घमंड में चूर- इससे कितना हो रहा, पूरण तव का काज।। किया विदाई सुता की, उतर गया सिर भार। अब लगता जैसे मुझे, दिया ईश ने तार। यही हमारी सोच है, जब तक बेटी पास- कर पाए जब हम विदा, समझ रहा उद्धार।। जितने दुर्गुण आपमें, करो विदाई आज। इसमें मिलना है नहीं, तव सिंहासन ताज। ज्यादा सोच-विचार में, मिलना क्या है लाभ- ईश कृपा जब शीश पर, जीवन सुंदर साज।। मेरे मन ने जब कहा, बेच दिया ईमान। नाहक लेता क्यों भला, आप बताओ ज्ञान।। धर्म -कर्म मन मीत है, व्यर्थ सुनें क्यों गीत - भले आप कहते रहो, यह मेरा अभिमान।। घन गरजे नभ छा गए, बढ़ी धरा की आस। तरुवर पर बूँदें गिरी, हरियाली उल्लास।। मोर पपीहा गा रहे, सावन वाले गीत - पड़ें फुहारें झूमकर, जीवन हुआ उजास।। पावस आई है धरा, ले हरियाली साथ। सूखे माथ किसान के, नव उम्मीदें हाथ॥ बिजली चमके गगन में, बगिया नाचे मोर- पावस ही तो जगत का, सबसे प्यारा पाथ॥ बूँद-बूँद धरती हँसी, बादल करते शोर। पावस आया गाँव में, हरियाली घनघोर। नदियाँ मस्ती में बहें, सीमाओं को तोड़ - कृषकों का भी ध्यान अब, नई फसल की ओर।। जब नाचे काली घटा, बिजली करती ताल। रिमझिम बारिश रागिनी, खुशियाँ सावन भाल। पावस आने से लगे, जीवन पुनः जवान - हर मुख पर मुस्कान है, खिलते गाल-कपाल।। लीपापोती हम सभी, करते रहते रोज। लेते इसकी आड़ बस, निहित स्वार्थ की खोज। देते दूजा ज्ञान हैं, बनकर बड़े महान- मुफ्त अगर मिल जाय तो, करते सतुआ भोज।। आशा का अंशू लिए, उम्मीदों की छाँव। फैल रही मुस्कान भी, चलती नन्हें पाँव। हार नहीं माना कभी, बढ़ता जाता नित्य- चमक रही किरणें जहाँ, वही हमारा गाँव।। आँखों से जब भी बहा, अंशू पीड़ा धार। दिल के अपने घाव को, दे मरहम का सार। नहीं छुपाते हम जिसे, लेकर पर्दा ओट- सहते हैं चुपचाप सब, समझ मौन व्यवहार।। दर्द झेलती बेटियाँ, किसको इसका ध्यान। हम सब केवल पढ़ रहे, मानवता विज्ञान।। मरी हुई संवेदना, करें भला क्या फिक्र- बेटी तो अपनी नहीं, फिर क्यों दे हम जान।। जनसंख्या का हो रहा,अब नूतन विस्फोट। आने वाले हैं समय, लगनी सबको चोट।। समझ नहीं क्यों आ रहा, कहें मित्र यमराज - जाने कैसा है भरा, हर जन-मन में खोट।। खाना जैविक अन्न है, बनना है बलवान। बीमारी भी दूर हो, जीवन सुखद सुजान। रखना है अब राष्ट्र से, जहर रसायन दूर- यारी करना प्रकृति से, संग ईश का गान।। जैविक खेती सब करें, यही आज का ज्ञान। प्रकृति संग में प्यार से, रहना लें हम जान। जहर रसायन से नहीं, तन-मन होगा स्वस्थ- जीना हमको क्यों भला, नियम विरुद्ध विधान।। जैविकता से कीजिए, आप सभी गठजोड़। कृत्रिम रसायन आज से, दें हम सब अब छोड़। इतना भी विज्ञान के, बनिए नहीं गुलाम- वरना इक दिन जगत को, रख देगा ये तोड़।। बेमतलब नित बढ़ रहा, आज बहुत अपराध। बड़ा प्रश्न है सामने, कौन रहा क्या साध। जाने क्यों इनको लगे, यही हमारा लक्ष्य - इसीलिए तो प्रगति पथ, श्रद्धा बड़ी अगाध।। नफ़रत जो भी बो रहे, काटें वो विष बेल। मीठा बेंचें जहर जो, कहर रहे नित झेल।। घर-घर में है बढ़ रही, आपस में तकरार- नफ़रत की आँधी चले, बिखर रहा है मेल।। नफ़रत की दीवार में, बंधा आज इंसान। प्रीत भूल कर बैर में, खो बैठा सम्मान। यही आज का दर्द है, झेल रहे हैं लोग- प्रेम बिना जीवन लगे, जैसे रेगिस्तान।। आस्था ही वो दीप है, जलती जो दिन रात। गिरे हुए इंसान भी, समझें इतनी बात। टूटे सपने भी जुड़ें, अगर भरोसा साथ - भरती सारी घाव को, बिना लगे आघात।। मौन साधकर बैठे रहना, क्या जीवन का सार। मानव होना व्यर्थ मानकर, क्यों जीते हो यार। अन्याय के आगे भला क्यों , बंद किए क्यों होंठ- भले बोध तुमको ना होता, पर यह तव की हार।। चोरी भी तो कर्म है, करते हैं कुछ लोग। फिर नाहक क्यों आप सब , लगा रहे अभियोग। बुद्धि ज्ञान अरु धैर्य है, इसका अनुपम सूत्र - लाज-शर्म से हीन जो, कहते इसको रोग।। होती जय-जयकार है, जगन्नाथ सरकार। निकल पड़े रथ बैठकर, उल्लासित संसार। जगन्नाथ प्रभु कीजिए, आप जगत कल्याण- जन-मन सब खुशहाल हो, आपस में हो प्यार।। राजनीति के खेल का, अजब-गजब है रंग। जैसे इसमें पड़ गया, स्वार्थ लोभ का भंग। पीट रहे यमराज जी, माथा अपना रोज- जाने कैसा हो गया, इसका जीवन ढंग।। आसमान से जब गिरी, बूँद एक अनमोल। स्वाति नाम की चमक से, मिश्री का रस घोल। नाजुक सी पर है अडिग, चलती अपनी चाल- बेटी स्वाति सी आँगना, मीठी वाणी बोल।। कमज़ोरी बिल्कुल नहीं, स्वाति की पहचान। खुद की धुन में ही चले, रखकर अपना ध्यान। बनती मोती बूँद से, बात करे अनमोल - स्वाति की मुस्कान से, खुशियाँ सकल जहान।। आया ऐसा है समय, सहिए अत्याचार। क्यों रोते हो व्यर्थ में, कब सुनती सरकार।। यही भाग्य का खेल है, छोटी सी है बात- चाहे जितना आप हों, भले आज लाचार।। सुना कारगिल नाम तो, भरी आँख में नीर। सीना छलनी हो गया, मगर न हारे वीर।। कहते हैं यमराज जी, वो भी था इक दौर- मातृशक्ति ने सीख दी, रहिए बस गंभीर।। लिखा कारगिल युद्ध ने, एक नया इतिहास। दुश्मन को बिल्कुल नहीं, था इसका आभास।। कहते हैं यमराज जी, रोया था तब पाक- कौशल देखा हिंद का, भूल गया तब आस।। एक-एक इक्कीस को, नहीं मानिए बीस। वरना प्यारे आपकी, सब देखेंगे खीस।। कहें मित्र यमराज जी, बनो धीर गम्भीर - रिश्तों के भी भाव अब, होंते हैं छत्तीस।। ******* रोला मुक्तक ******** अलख जगाए धर्म, आज की बड़ी जरूरत। करिए अपना काम, संग बदलिए सूरत।। कहें मित्र यमराज, दौर आया अब मुश्किल - सोचो सारे लोग, बने रहना क्यों मूरत।। नयी नहीं है बात, रोज का काम हमारा। झूठा कहे समाज, हमें तो लगता प्यारा। लीपापोती काम, यार पुश्तैनी धंधा - कहें मित्र यमराज, चले ऐसे जग सारा।। विधि का अजब विधान, कौन है इसका दोषी। बस इतनी सी बात, व्यर्थ बनना है रोषी।। कहें मित्र यमराज, जमाना कैसा आया- मानव माने आप, करे खुद पाला- पोषी।। कुंठित धरती आज, प्रलय को दे आमंत्रण। जूझ रहे हैं लोग, करें हम इससे क्या रण। कहें मित्र यमराज, भूल है पड़ती भारी - कहाँ प्रलय के पास, लाभ कोटा आरक्षण।। जबसे यूपी में बनी, योगी की सरकार। चहुँदिश में नित बढ़ रही, नाहक ही तकरार। सत्ता से जो दूर हैं, वो इतना बेचैन- पूछ रहे यमराज से, घर बैठें क्या यार।। संगम जैसा आज, बचा क्या कोई रिश्ता। मानवता का सार, आज सब जाता पिसता। कहें मित्र यमराज, व्यर्थ मन पीड़ा कहना- मजबूरी के नाम, मनुज अब खुद को घिसता।। राजनीति का खेल, समझना सबसे भारी। चाहे जितनी खास, आपकी इससे यारी। कहें मित्र यमराज, खेल सब खेल न पाते- सबसे ज्यादा आज, इसी में हो गद्दारी।। इंद्रदेव जी आप, हठी मत बनिए इतना। सूख रहे हैं होंठ, नहीं तुम जानो कितना।। कहें मित्र यमराज, आप इतना मत ऐंठो। कर पूरा कर्तव्य, आप फिर सोते बैठो।। जल भराव चहुँओर, हुई वर्षा जब भारी। हुए आज नाकाम, सभी की सब तैयारी।। कहें मित्र यमराज, इंद्र की कैसी माया। गुस्से में अब लोग, खूब उनको दें गारी।। कौन हमारी बात, भला कोई क्यों सुनता। हम तो केवल आज, बने पिछलग्गू जनता।। कहें मित्र यमराज, उठाओ सिर पर बोझा। देता नेक सलाह, यही कलयुग का ओझा।। मत डालो व्यवधान, नहीं तो मुश्किल होगी। फिर मत कहना आप, बने हम नाहक रोगी।। रहना हमसे दूर, यही बस अच्छा होगा। पहले जाकर पूछ, जिसे उन सबने भोगा।। ******** सरसी छंद मुक्तक *********** कर्मो का परिणाम हमेशा, देता सबको सीख। पर ऐसा सबको लगता है, नहीं रहा है दीख।। भला कौन अब इन बातों पर, करता तनिक विचार - सभी दंभ में अपने ही हम, मान रहे हैं भीख।। खोटी किस्मत दीन दुखी की, सब किस्मत का खेल। जैसे चलती है दुनिया में, तरह-तरह की रेल।। भाग्य भरोसे काटें जीवन, हँसना रोना संग- भला सभी का कब होता है, किस्मत बंधन मेल।। क्या तू मुझको बदल सकेगा, कोशिश कर ले यार। हर हथकंडे अपना देखा, बदले नहीं विचार।। कर सकते सहयोग हमारा, मानूँगा एहसान - मुझको तो ऐसा लगता है, मिलना केवल हार।। परिणामों के भय से पापी, करते दो-दो हाथ। नहीं मानते पाप कर्म को, चाहे फूटे माथ। लुटा रहे दुनिया में गरिमा, मचा-मचा कर शोर- कौन जगाने आने वाला, या फिर देने साथ।। हरी भरी हो धरा हमारी, ईश्वर दो वरदान। अतुलित खुशियाँ इतनी सारी, नित्य धरा पहचान। हम सब प्राणी मिलकर देंगे, जग ऐसी सौगात- निश्चित ही तब सभी करेंगे, इक दूजे पर अभिमान।। सदा साफ पहचान धरा की, देनी है सौगात। कैसे भी अब हमको करना, इतनी सी अब बात। हरी भरी हो धरा हमारी, लेना है सौगंध- नहीं किसी को छूट मिलेगी, करे धरा अब घात।। याद रहेगा अब तुमको क्यों, जब है ऐसी सोच। दारु पीकर नाचो-गाओ, भले कमर में मोच।। रहा कौन कह बोलो तुमको, रखना इतना याद - अब तो प्रिय यमराज हमारे, नहीं रहे हैं नोच।। सूख रही बिन वर्षा धरती, किसका है ये पाप। इंद्रदेव जी क्रोधित हैं क्या, या कोई संताप।। सभी चाहते बरसें बादल, खूब झमाझम आज- धरा संग हर प्राणी करता, कंठी माला जाप।। मौन साधकर बैठे रहना, क्या जीवन का सार। मानव होना व्यर्थ मानकर, क्यों जीते हो यार। भला आप अनीति के आगे, बंद किए क्यों होंठ- भले बोध तुमको ना होता, पर यह तव की हार।। खुले गगन में थककर पंछी, लौट करें विश्राम। थककर होते चूर बहुत वे, करते हैं आराम। यही रीति सदियों से चलती, जान रहे हम आप- फिर भी हम सब भला आज भी, क्यों इतना नाकाम।। आज भरोसा टूट गया है, चिंता की यह बात। नहीं किसी में शेष बचा है, अब सुंदरतम गात। समय आड़ में कब है अच्छा, मुँह लेना ही मोड़ - शांत भाव से कमियाँ खोजो, बिना किए उत्पात।। चहुँदिश रार नित्य ही फैले, चेतो अब सरकार। खोजो ऐसी राह आज अब, लगे एक हथियार।। कैसे हो उपचार समस्या, बिना किसी अब द्वंद्व - आज देश दुनिया भी देखे, होता कैसे वार।। इतना तुम क्यों परेशान हो, नहीं समझते सार। क्यों सारा कुछ अपने कंधे, लेते नाहक भार। भूले शिष्टाचार सभी हैं, तुम्हें नहीं क्या ज्ञान - यही आज का समय देखिए, रहो बने होशियार।। सुधीर श्रीवास्तव
