नया सवेरा
नया सवेरा
अँधेरी रात के बाद,
दूर क्षितिज के उस पार,
सुदूर पेड़ों की झुरमुटों को चीर कर
जब सूर्य की किरणे धरती पे गिरती हैं
तो होता है नया सवेरा !
पिघलकर बर्फ से,
पर्वतों का पानी,
जब चीर के सीना धरती का,
बन के नदी बहता है,
तो होता है मिलन उसका सागर से !
जब चीर के पेड़ों के तनो को,
पाटते हैं नदी के दोनों किनारों को,
तो बनता है सेतु !
जब होता है सवेरा नया,
खिलते हैं फूल नए,
उगती हैं कोपलें नयी पेड़ो पे,
बहता है अल्हड झरना,
खिल उठती है प्रकृति,
तब इंसा तो क्या
जानवर भी झूमने लगते हैं !
जब ख्वाब तुम्हारे टूटने लगे,
मंजिलें भी दूर लगने लगे,
मन को अपने विश्राम देना,
इच्छाओं को पूर्ण विराम देना,
पूरी तरह तल्लीन होकर,
मेहनत कड़ी लगन से करना,
तब असंभव को भी आसानी से पाओगे,
तुम भी इस प्रकृति की तरह खिल जाओगे !
