नया सवेरा
नया सवेरा
अँधेरी रात के बाद,
दूर क्षितिज के उस पार.....
सुदूर पेड़ों की झुरमुटों को चीर कर,
जब सूर्य की किरणें धरती पर गिरती हैं,
तो होता है नया सवेरा!
पिघलकर बर्फ से,
पर्वतों का पानी,
जब चीर कर सीना धरती का,
बन के नदी बहता है,
तो होता है मिलन उसका सागर से !
जब चीर कर पेड़ों के तनो को,
पाटते हैं नदी के दोनों छोरों को,
तो बनता है सेतु!
जब होता है सवेरा नया,
खिलते हैं फूल नए,
उगती हैं कोंपले नयी पेड़ों पर,
बहता है आह्लाद झरना,
खिल उठती है प्रकृति,
तब इंसा तो क्या
पशु-पक्षी भी झूमने लगते हैं!
जब ख्वाब तुम्हारे टूटने लगे,
मंजिले भी दूर लगने लगे,
मन को अपने विश्राम देना,
इच्छाओं को पूर्ण विराम देना,
पूरी तरह तल्लीन होकर,
मेहनत कड़ी लगन से करना,
तब असंभव को भी संभव कर पाओगे,
रेगिस्तान में फूल खिलाओगे....
तुम भी इस प्रकृति की तरह खिल जाओगे!
