STORYMIRROR

Pragya Kant

Abstract

4  

Pragya Kant

Abstract

नवजीवन

नवजीवन

1 min
73

है छँट जाती जैसे घटा चाहे लाती

स्मिति या दे वो सुख का मुख हटा

क्षणभंगुरता ही है सार बनके आती है


माँ की ममता छोड़ नियति

स्थिरता कहीं न लाती है

जिस ज्ञान ने पार्थ को रणभूमि

पर कृतार्थ किया कर्म हो सर्वोपरि


इसने भी यह भावार्थ दियाआशा का

अंशुमाली जब पर पसारे आता है

दिवस के उत्थान-अवसान मध्य

यहअवसर नवीन दे जाता है !


है झुक जाते ऊँचे तरुवर शिखर है

घिस जाते पर्वत के सर सर्वथा

ना कुछ टिकता है दुर्दिन हो तो

सोना भी कौड़ी भाव ही बिकता है


कर्म जिसका आलिंगन भीड़ में 

हो या एकांत करे जीवन पथ पर

अग्रसर होकर वह एक दृष्टांत बने

काली घटा भले ही आज


प्रगाढ़ दिख पड़ जाती है,

परन्तु है छँट जाती ऐसे घटा

चाहे लाती स्मिति या 

दे वो सुख का मुख हटा !


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract