मज़ाल है
मज़ाल है
हर दिन आग है, आसमां धुआँ
मज़ाल है मेरी मैं उसमें जल जाऊँ
मज़ार शायद बन जाए।
आँधी चीखते हुए सब तहस-नहस कर देती है
मजाल है तुम्हें कि तुम समझ पाओ
रुख़सत शायद हो जाए।
पैरों में दर्द सताये बैठा है
मज़ाल है मेरी मैं उठ जाऊँ
वक़्त बर्बाद शायद हो जाए।
आँखें धुंधली, सर दर्द ले खामोश है,
मज़ाल है मेरी मैं हवा बन जाऊँ
ज़िन्दगी जहन्नुम शायद बन जाए।
