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Kaushal Sheth

Abstract

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Kaushal Sheth

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मुसलसल

मुसलसल

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तहरीर मुसलसल है ,तक़रीर मुसलसल है ,

और महेरबाँ हमारी तक़दीर मुसलसल है ,


तूफान कई आए  इस ज़िंदगीमें अब तक ,

हर बार पर हमारी  तदबीर मुसलसल है ,


है पूछना खुदासे ,  ऐसा है क्यों बनाया ,

चारों तरफ जहाँमें  तक़्सीर मुसलसल है ,


दहशतग़रोंकी देखो ये दहशतें है कैसी ,

हर खौफमें उन्हींकी तसवीर मुसलसल है ,


फिरभी हैं बंदगीमें मसरुफ सब खुदा की ,

सुबहा से शाम देखो तकबीर मुसलसल है ,


रखना तू स्तब्ध सोच तेरी अपने तलक ही,

यहां सोचनेवालोंकी तहक़ीर मुसलसल है ।


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