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Dr.sunil Parit

Abstract

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Dr.sunil Parit

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मुक्त

मुक्त

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हे मेरे परमपिता

मुझे मुक्त कर दे

इन जंजीरों से

मुझे मुक्त कर दे


मेरी मंजिल कहाँ है

ये मैं नहीं जानता

मेरा यान कहाँ जा रहा है

ये मैं नहीं जानता ।


इन बंधनों में जकडकर

स्थिति ऐसी बन गई है

साँस नहीं ले पा रहा हूँ

हरदम घुटन सी होती है


दिल को पत्थर बना लेता हूँ

चल तू मुझे मुक्त कर दे

अब मेरे आत्मा को 

परमात्मा में लीन कर दे ।


सहता हूँ सबकुछ चुपचाप

रोता हूँ मन में चुपचाप

चला आता हूँ तेरी ओर चुपचाप

तू मुझे मुक्त कर दे चुपचाप।


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