STORYMIRROR

Dr.sunil Parit

Abstract

4  

Dr.sunil Parit

Abstract

मुक्त

मुक्त

1 min
337

हे मेरे परमपिता

मुझे मुक्त कर दे

इन जंजीरों से

मुझे मुक्त कर दे


मेरी मंजिल कहाँ है

ये मैं नहीं जानता

मेरा यान कहाँ जा रहा है

ये मैं नहीं जानता ।


इन बंधनों में जकडकर

स्थिति ऐसी बन गई है

साँस नहीं ले पा रहा हूँ

हरदम घुटन सी होती है


दिल को पत्थर बना लेता हूँ

चल तू मुझे मुक्त कर दे

अब मेरे आत्मा को 

परमात्मा में लीन कर दे ।


सहता हूँ सबकुछ चुपचाप

रोता हूँ मन में चुपचाप

चला आता हूँ तेरी ओर चुपचाप

तू मुझे मुक्त कर दे चुपचाप।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract