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pratibha purohit

Abstract Inspirational


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pratibha purohit

Abstract Inspirational


मॉं

मॉं

1 min 343 1 min 343

माँ तुम हो

व्याखा

मेरे दिल की 

मां मैं समेट लूँ

स्मृतियों की कतरने


एक एक करके

तुम मुझे बाँहों में 

भर लेना।


मैं तुम्हें देर तक

सहेजती रहूंगी।

कहीं दूर क्षितिज की मानिंद।

चाँद को छूती

तुम्हारी बिंदी।


कहीं देर रात

खिलती रात रानी की महक

की तरह

तुम मेरी नस नस में

समा जाती हो।


मॉं

मैं हर क्षण

तुम्हें अपने पास

पाना चाहती हूं।


पसर जाता है सन्नाटा तब भी,

होती है

भोर जब तक।


सारे दिन घर में 

बस चलती रहो मॉं

मेरे केनवास में रंग बिखेरो मॉं

सुन्दर पंखुड़ी बन कर खिलखिलाओ

मैं हर तरह महसूस करना चाहती हूं

हर सांस तक।


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