मंगल ग्रह पर मेरी पहली रात प्रियतमा के साथ
मंगल ग्रह पर मेरी पहली रात प्रियतमा के साथ
🌹 मंगल ग्रह पर मेरी पहली रात, प्रियतमा के साथ 🌹
✍️ श्री हरि
🗓️ 5.10.2025
लाल धूल के आँचल तले,
जब सूर्य ने धीमे से विदा ली,
तब उस निर्जन ग्रह पर
हम दो ही जीवित थे —
मैं और मेरी प्रियतमा।
आकाश में पृथ्वी तैर रही थी
जैसे कोई नीला दीप,
और उसकी ज्योति में
तेरा चेहरा —
चाँदनी का नहीं, मंगल की लाली का दर्पण लग रहा था।
हमारे बीच कोई फूल नहीं खिला,
पर तेरे स्पेससूट की पारदर्शिता में
मैंने प्रेम की वही सुगंध पाई
जो पृथ्वी के वसंत में कभी महसूस हुई थी।
चारों ओर मौन था —
वह गहरा, लाल, और अनंत।
पर उस मौन में हमारी साँसें
कविता की तरह मिलती रहीं —
जैसे दो तारिकाएँ
ब्रह्माण्ड में अपना नक्षत्र रच रही हों।
तू बोली — “यहाँ प्रेम भी अलग लगेगा।”
मैं मुस्कराया —
“हाँ, क्योंकि यहाँ गुरुत्वाकर्षण कम है,
और प्रेम का भार ज़्यादा।”
फिर हम चुप हो गए —
क्योंकि शब्दों की अब आवश्यकता नहीं थी।
तेरी आँखों में मैंने देखा —
धरती का सारा सौंदर्य,
और अपने भीतर महसूस किया —
ब्रह्माण्ड का सारा अर्थ।
वह रात —
जब मंगल की मिट्टी पर
प्रेम ने पहला पदचिन्ह बनाया।
न कोई संगीत, न कोई फूल,
फिर भी संसार का सबसे सुंदर क्षण —
वह था,
जब मैंने तुझे कहा —
“अब यह ग्रह भी हमारा है,
क्योंकि हमने इसे प्रेम से छुआ है।” ❤️

