मेला
मेला
मुन्नी पिंटू भोलू इमली खुश हैं सब बच्चे सारे
सालभर करें प्रतीक्षा दस दिन आते मस्ती वाले
रहता वीरान अँधेरा घना जहाँ कोई भी न फटकता
वहां उजियारी लड़ियों से सजा हर साल दशहरा मनता
दस मुंह वाला रावण और कुआँ मौत का अलबेला
फालूदा घेवर चुस्की पापड़ी का स्वाद संग लाये मेला
पर सबसे सुन्दर है वो खिड़की रूपहली और निराली
जिसमें कल्लू सिंह दिखलाता कठपुतलियाँ मतवाली
हीर राँझा राजा रानी और परियां पंखों वाली
प्रेम के गीत गायें कभी और लड़ें कभी दे गाली
धागों से बंधी हैं तब भी स्वांग हैं पूरा रचतीं
पीली नीली सतरंगी चुनरी में कितनी सुन्दर लगतीं
काश हम बच्चे भी ऐसी सुन्दर कठपुतली होते
गाँव शहर घूमते फिरते और मन सबका मोहते
जीवन है रंगमंच यहाँ हर पल कठपुतली का खेल
मेले में आते जाते सब सुख दुःख का अनोखा मेल।
