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Swastik Singh Rajput

Abstract Tragedy

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Swastik Singh Rajput

Abstract Tragedy

Maut

Maut

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कानों में गूंजी एक चीख सी

वो मेरे अंतर्मन की शांति की भीख थी

माला बनाकर मेरी नाकामियों का

मुकुट मेरी नादानियों का

पहना कर मुझको वो मर गया

मेरी सारी उलझनों का देकर मुझको वो कर गया


ये जो जीवन सहता था मैं शान से, अब इससे हूँ मैं डर चुका

कितनी रातें ऐसी हैं जिनमें मैं उससे लड़ चुका

क्यों वो इतना रोता था

दुख तो बीत जाता है?

क्यों वो इतना सहमा था

सबके जीवन में दुख आता है?


मैंने ऐसा क्या किया, क्यों वो मुझको कोसता?

मैं तो बस उसे अनसुना करता और अपना सर नोचता

उसका दुख थोड़ी बड़ा है?

जगत में कोई भूखा सोया और किसी का अपना मरा है


जब मौत उसकी जीत थी तो जीवन की हार मैं क्यों सहूं

क्यों अब जब वो मर गया मैं जीता रहूं

अंतर्मन तो मर गया, अब मर गया है मन मेरा

उब गया इस दुनिया से, गाड़ दो अब तन मेरा



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