Maut
Maut
कानों में गूंजी एक चीख सी
वो मेरे अंतर्मन की शांति की भीख थी
माला बनाकर मेरी नाकामियों का
मुकुट मेरी नादानियों का
पहना कर मुझको वो मर गया
मेरी सारी उलझनों का देकर मुझको वो कर गया
ये जो जीवन सहता था मैं शान से, अब इससे हूँ मैं डर चुका
कितनी रातें ऐसी हैं जिनमें मैं उससे लड़ चुका
क्यों वो इतना रोता था
दुख तो बीत जाता है?
क्यों वो इतना सहमा था
सबके जीवन में दुख आता है?
मैंने ऐसा क्या किया, क्यों वो मुझको कोसता?
मैं तो बस उसे अनसुना करता और अपना सर नोचता
उसका दुख थोड़ी बड़ा है?
जगत में कोई भूखा सोया और किसी का अपना मरा है
जब मौत उसकी जीत थी तो जीवन की हार मैं क्यों सहूं
क्यों अब जब वो मर गया मैं जीता रहूं
अंतर्मन तो मर गया, अब मर गया है मन मेरा
उब गया इस दुनिया से, गाड़ दो अब तन मेरा
