मानवीय मूल्यों की माला
मानवीय मूल्यों की माला
मानवता की झोली भरना संस्कारों के मोती से
जग को तुम भी रोशन करना अपने ज्ञान की ज्योति से
भेदभाव या ऊँच नीच का भाव न लाना प्यारे तुम
बेर को खाने शबरी के वो राघव बन दिखलाना तुम
जिसके खातिर चमड़े में भी वो पावन गंगा आयी
एकलव्य ने निष्ठा की अद्भुत मिसाल थी दिखलाई
उत्तर के लिए ध्रुव का वो प्यार अनोखा देखा है
राम भरत सा राग यहाँ ओर त्याग अनुपम देखा है
अपने है अपनों को मिलाना प्रेम, समर्पण प्रीति से
जग को तुम भी रोशन करना अपने ज्ञान की ज्योति से
मिथ्या कोई दंभ न भरना झूठी शानो-शौकत में
सदा बढ़ाना हाथ मदद का बेबस ओर लाचारों में
केवल ऊँची शिक्षा से कोई बन पाता महान नहीं
मानवता है अगर किसी में, डिग्रियों का मौल नहीं
मंदिर भले ना जा पाओ अपने मन को मंदिर रखना
माता पिता गुरु सेवा करना याद यही तुम रखना
अपनेपन का भाव सदा हो मनुजता की रीति से
जग को तुम भी रोशन करना अपने ज्ञान की ज्योति से।
