लफ्ज़
लफ्ज़
जब भी अपने लफ्ज़ एक कागज के पन्ने पर उतारती हूँ,
चहरे पर एक मुसकान आ जाती है,
और फिर तेरी याद आ जाती है।
तू दूर था, लेकिन हमेशा दिल के करीब रहा।
तू दिल में रह कर भी ईतनी दूर क्यूँ था ?
आज भी तूमहारी तस्वीरें, मेरे फोन के गैलरी के
एक फोलडर मे रखी है।
आज भी मुझे वो एक-एक पल याद है,
जो हमनें साथ बिताये।
क्यूँ ? इतना आसान था क्या ?
तुम्हारे लिए मुझे छोड़ कर जाना ?
फिर एक नया सवेरा, फिर वही सूरज,
फिर वही नजारे।
लेकिन आज कुछ अलग था।
आज तुमहे, हमारी याद आई थी,
आज तूमने हमसे मिलने कि ख्वाईश जताई थी।
वो लम्हा कुछ ऐसा था,
कि ना खुशी बयान कर सकी, ना दुख।
दुख, ईस बात का नहीं की तुम क्यू गयें।
दुख ईस बात का था, की जब आना ही था,
तो क्यूँ ये फासले दिये ?
क्यूँ इन किमती लमहों को यूँ गवारा होने दिया ?
अब बस बहुत हो गया।
अब और नहीं।
अब ओर रुठना, मनाना नहीं,
ओर तकलीफे नहीं ।
अब बस भी करो यार,
थोड़ा करलो ना प्यार।
लेकिन सुनो, अब आ ही गये हो तो,
मेरी एक बात पर गोर फरमाओ।
अब मैं तूतूंगी नहीं, और ना ही तुम तोड़ोगे मुझे।
बस इतना याद रखना, जो है इस पल,
वही सच है, वही मुनासिब है।
बस इसे ही मुकमंमल करना है।
जब भी अपने लफ्ज़ एक कागज के
पन्ने पर उतारती हूँ,
चेहरे पर एक मुसकान आ जाती है,
और फिर तेरी याद आ जाती है।
