STORYMIRROR

Amit Mishra

Abstract

4  

Amit Mishra

Abstract

कठिन डगर पे चल के ही

कठिन डगर पे चल के ही

1 min
453

जो वक़्त की बिसात पे

तू हौसले बिछाएगा

फ़लक नहीं है दूर फिर

सितारे तोड़ लाएगा


आँधियों के वेग में

अडिग खड़ा रहा अगर

रुख़ हवाओं का तू फिर

ख़ुद ही मोड़ पाएगा


कदम को कर कठोर तू

ख़ुद को जो जलाएगा

सदमें हर सफ़र के फिर

हँस के झेल जाएगा


निराश हो के रुक नहीं

हताश हो के थक नहीं

आशा की पतंग को

स्वयं ही तू उड़ाएगा


पर्वतों को तोड़ के

जो रास्ते बनाएगा

एक दिन ज़माना भी

पीछे पीछे आएगा


निगाह तेरी लक्ष्य पे

तू मुश्किलों से डर नहीं

कठिन डगर पे चल के ही

तू मंज़िलों को पाएगा




विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract