STORYMIRROR

Birendra Lodhi

Abstract Classics

4  

Birendra Lodhi

Abstract Classics

कितनी रागिनियां है बाजारों में

कितनी रागिनियां है बाजारों में

1 min
312

कितनी रागिनियां है बाजारों में,

जहां उमड़ती है भीड़ बाजारों में


घर से लेकर बाजारों तक

सज गए हैं अंबर से लेकर चौराहों तक,


चेहरे में मुस्कान नन्हें से हाथों में

फुलझड़ी की कमान

यहीं तो हैं मेरा भारत महान।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract