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Ankit Sharma

Abstract

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Ankit Sharma

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किसी और का होने ना दूंगा

किसी और का होने ना दूंगा

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वो दोस्त समझ रही थी,

मैं इश्क़ समझ बैठा,

वो अपना किस्सा सुना रही थी,

मैं कहानी बना बैठा।


वो रहना चाहती थी साथ मेरे,

फ़ोन की घंटी पर,

मै बनाकर अपना लाना

चाहता था उसे घर।


वो मोम सी नज़ुक लगी मुझे,

पर मैं बर्फ सा पिघल गया।

मैं, जो चाहता था, सिकंदर बन जाना,

उसकी अवाज में घुल गया।


वो कहती थी दोस्त मुझे,

मैं उससे इश्क़ करने लगा,

वो अपना समझ कर

बात करती थी मुझसे,

मैं खुद को उसका

दीवाना समझने लगा।


वो बस एक ख्वाब है,

कहीं टूट ना जाये।

वो गहरा एक राज है,

कहिं चूक ना जए

मैं उसे अपना सपना

बनाना चाहता हूँ,

कहिं छूट ना जाये।


क्या गजब जिन्दगी है, 

वो जो दूर जाना चाहता है,

पास आता है,

और जिसे तुम

ढूंढते हो खो जाता है।


मैं इसे खोने ना दूंगा,

जिसने मुझे हँसाया,

उसे कभी रोने ना दूंगा,

ए दोस्त जो तू मेरा ना हुआ, तो

तुझे किसी और का होने ना दूंगा।


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