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Ankit Sharma

Abstract

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Ankit Sharma

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बहुत दूर अब भोर नहीं

बहुत दूर अब भोर नहीं

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बन्द अकेले कमरे में,

वो बीच दोपहरी रोता था,

करवट बदलता, पानी पीता,

बस ऐसे ही वो सोता था,


हंसी भी मानो, उसकी

दम घुटने सी लगती थी,

हार गया था वो खुद से ही,

जो पतंग उड़ी थी दूर क्षितिज तक,

हर पल अब वो कटती थी।


फिर एक नन्ही चिडिया को,

उसने दाना ले जाते देखा।

लड़ रही थी वो हवा से,

शायद उसके बस की बात नहीं,

गिरा चिडिया को उडा ले गयी दाना,

उस हवा में शायद जज्बात नहीं।


उसके बच्चे भूखे होंगे,

शायद हवा को पता नहीं,

चिडिया को वो धूल चाटा दे,

वो हवा की औकात नहीं।


उठी फिर से, पंख सवारती

फिर खेतों की ओर चली,

बच्चे भूखे अब ना रहेंगे,

कह कर वो इस बार चली।


फिर पंख फेंक अट्टारी पर,

वो जा बैठी मुंडारी पर,

यह देख, वो हँस बैठा,

तूफान का गरूर, अब खस बैठा,

वो लेकर फिर एक दाल चली,

अब लगने लगी, बवाल चली।


सीधा पहुंची अब मंजिल पर,

उसको रुकने का छोर नही,

भले अंधेरी रात अभी,

बहुत दूर अब भोर नहीं।


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