सोचता हूँ आज फिर इश्क़ लिख जाऊँ
सोचता हूँ आज फिर इश्क़ लिख जाऊँ
बड़े दिन हो गए, तेरे जाने के बाद,
कभी कलम उठायी तो बस,
तुझे नीचा दिखने के लिये,
तुझसे हर चोट का जवाब पाने के लिये,
शायद तुझे फिर मनाने के लिये।
बड़े दिन हो गए ,
वो कागज़ सूने पड़े है,
जहां सिर्फ तेरा हस्ता हुआ चेहरा दिखता था,
आंख बन्द करके भी
जिसके लिये मैं लिखता था।
हां मान लिया मैंने,
तेरे वादे सारे झूठे थे,
वो जो कभी गलत नहीं थी
मेरे लिये उसे झूठी का नाम मिला,
और जो मरने का सपना देखा था,
तेरी गोद में, उसे जुदाई अंजाम मिला।
देख बहुत टूट कर इश्क़ किया तुझसे,
अब मर जाने को जी करता है,
पर वो वक़्त गुजारा तेरी गोदी में सिर रखकर,
वो फिर पाने को जी करता है।
तेरे झूठे वादों में जबसे मुझे तोड़ा है,
अब याद पुराना क्या रखूं,
पर वो पेहला गुलाब याद आता है,
बस उसे याद कर सोचता हूँ,
दिल से आज फिर इश्क़ लिखू।
फिर ढूँढ लाऊं कोई ऐसी, जिसे मैं समझ आऊँ,
मुस्कुराता देखकर पूछे की, क्या बात है,
क्यू फर्जी मुस्कुरा रहे हो,
क्या हुआ किसकी याद छुपा रहे हो ?
वो पूछे, मैं बताऊं,
फिर सच में मुस्कुराऊँ,
और धीरे से उसके गले लगके रो जाउँ।
शायद यही वो एहसास है
जिसे सोचकर डगमगाऊँ,
सोचता हूँ आज फिर इश्क़ लिख जाऊँ।
