Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

Pratibha Dwivedi

Abstract

5.0  

Pratibha Dwivedi

Abstract

खत

खत

1 min
243


खत लिखना है फौजी को 

कहना है जब हम कड़ी धूप में

घर से बाहर निकलते हैं

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


जब कड़कड़ाती ठंड में

निकलती हूँ मैं घर से बाहर

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


हम घरों में चैन से सोते हैं

तुम रातों को भी पहरा देते हो

जब हमको जागना पड़ता है

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


तुम लहूलुहान होकर भी

मेदानेजंग में दिलेरी से लड़ते हो

जब चोट कभी हमें लगती है

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


हे ! जाँबाज तुम्हें नमन "प्रतिभा" का

खौफ नहीं तुमको खतरों का

गर डर कभी हमको सताये तो

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


तुम वतन के रखवाले हो

तुम पर आँच कभी ना आये

गर खतरा तुम पर मँडराये तो

उम्र हमारी तुमको लग जाये ! 


तिरंगे में जान बसे तुम्हारी

तिरंगा ही है शान तुम्हारी

जब तिरंगे में लिपटकर जाते हो

तुमको दिल से सलाम निकलता है !


रुंध जाता है गला हमारा

जब कोई फौजी जांन गँवाता

तुम रहो सलामत वतन की खातिर

पैगाम ये दिल से निकलता है।


मरकर भी अमर कहलाने वाले

तुमको सलाम दिल से निकलता है !

तुमको सलाम दिल से निकलता है !


Rate this content
Log in

More hindi poem from Pratibha Dwivedi