STORYMIRROR

Aravind Kumar Singh Shiva

Abstract

4  

Aravind Kumar Singh Shiva

Abstract

॥ खंजर ॥

॥ खंजर ॥

2 mins
286

कारण क्या था पता नहीं,

थी मेरी कोई खता नहीं,

वो पाँव पटककर चलें गए,

मैं नासमझ अभी तक खड़ा वही ।


आशा थी की पलटेंगे वो,

कुछ बोलेंगे कुछ समझेंगे वो,

पर चलपड़ेः वे मतवालों से, 

फिर निकल पड़े बेगानों से ।


मैं आवाज़ लगाना चाहा था,

पर निकट खड़ा आवारा था,

वो अवारो की टोली में,

शामिल होकर मचल पड़े ।


मन ब्यथित हो घबराया था,

पर रोक नहीं मैं पाया था, 

मैं शब्द शून्य हो बैठा था,

जब उसको इतराते देखा था ।


जब जख्म संजोये सीने में,

पीछे मुड़ बढ़ा अँधेरे में, 

तब पीठ में खंजर घोपा था,

फिर भी मैं उसको नहीं रोका था ।


मेरी लहू देख वो मुस्कुराये थे,

फिर अवारो को भी ललकारे थे,

थोड़ा और लहू निकालो तुम,

कुछ और इसे तड़पाओ तुम ।


आवारे पागल हो बैठे,

ख़ंजरों से क़त्ल वो कर बैठे,

वो प्रफुल्लित हो उठे मेरी घावों पर,

मैं गिर पड़ा बीच चौराहे पर ।


राख़ बची थी शाख बची थी,

जीने का एहसास बचा था, 

चोटों से बहती लहुओ के संग,

मैं खड़ा हुआ तलवारो पर ।


मैं चोट छिपाने बैठा था,

कि वो फिर से पाँव पटक बैठे, 

मैं स्तब्ध खड़ा हो जाता हूँ,

फिर मंद मंद मुस्काता हूँ ....

मंद मंद मुस्काता हूँ.......



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract