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Neeraj Baghel

Abstract


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Neeraj Baghel

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खौफ खा ऐ जिंदगी

खौफ खा ऐ जिंदगी

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खौफ खा ऐ जिंदगी बदलने लगी है तू अब

मेरे उजड़े हुए से बगीचे मे दखल देने लगी है तू अब I


वो आँगन रहा नही मेरा, जहाँ तू हुक्म चलाया करती थी

जहाँ फूलों की पत्तियों से महकती, पेड़ों की टहनियों से चटकती थी I


उन मिटटी की गलियों मे जब पानी बन बह जाया करती थी

वो शाम की धूप सी चित्रकार मेरे आंगन में ठहर जाया करती थी I


वो आँगन नहीं, वो शाम नही, बस तू और तेरी यादें हैं

बदल गयी मौसम ऐ फ़िज़ाएं, बदल गयी हैं वो वादियाँ अब I


खौफ खा ऐ जिंदगी बदलने लगी है तू अब

मेरे उजड़े हुए से बगीचे मे दखल देने लगी है तू अब I



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