कैसा तेरा ये नाच नंगा
कैसा तेरा ये नाच नंगा
आज लहू ये सस्ता, पानी हैं महंगा।
बेच के तू ईमान क्यों अपनाये कुःसंगा।
कैसा तेरा नाच ये नंगा ॥
छू रहा हैं इन्सान ग्रह तारा सितारा ।
पा रहा हैं हर मंजिल हर नया किनारा।
तू तो लिये फिर रहा आतंकवाद सहारा।
पथ में बोये बारूद सुरंगा ॥
कैसा तेरा नाच ये नंगा ॥
एक ही संदेश गीता बायबल कुरान का ।
देती पाठ अमन शांति और सदाचरण का ।
तू तो हैं तोड़े नाता इनसानी रिश्ते चमन का।
लहू का प्यासा, रे अभागा ॥
कैसा तेरा नाच ये नंगा ॥
सूरज चाँद नभांगण से सबका एक ही नाता।
भेदभाव क्यों करे, जल वायु सबका त्राता ।
सिंच के खून पसीना कर उन्नत देश का माथा ।
लहराये ऊंचा गगन में तिरंगा ॥
कैसा तेरा नाच ये नंगा ॥
