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Shobha Sonkar

Inspirational

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Shobha Sonkar

Inspirational

कागज की हस्ती

कागज की हस्ती

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मानव की इस बस्ती में, 

काग़ज़ की भी इक हस्ती है, 

कभी बनकर रोकेट क्लास रूम में, 

तो कभी पतंग बन आसमान में उड़ती है, 

कभी बरखा की उस कश्ती में, 

हाँ बचपन की हर इक मस्ती में, 

काग़ज़ की भी इक हस्ती है, 


कोरे कागज की क्या बात कहूँ, 

है अनमोल यह नन्हे बालक के मन की भांति, 

जैसी परवरिश, वैसे संस्कार, 

जैसे चाहो तुम रंग भरो, 

दे दो चाहे जैसा आकार, 

मीठे कड़वे शब्दों के मोती से, 

बनती ये महंगी और सस्ती है.. 


काग़ज़ काग़ज़ इक दूजे से जुड़ जाते जब, 

तब इक किताब बनती है, 

जाने कितनों के भविष्य को रोशन वह कर देती है, 

बनता काग़ज़ जब अखबार, देता हमको सीख यही, 

जीवन भी है कुछ काग़ज़ जैसा, 

इक पन्ने पर खुशी की खबरें, 

दूजे पर है दर्द समेटे, 

फिर भी कीमत कभी न इसकी घटती है, 

हाँ मानव के जैसी ही, 

कुछ काग़ज़ की भी हस्ती है, 


चाहे हो किसी लेखक की लेखनी, 

या हो कवि हृदय के उदगार, 

खुद के तन को छलनी करके, 

सब के मन को वाचा देती, 

फिर भी आह कभी न भरती है, 

हाँ मानव की इस बस्ती में, 

काग़ज़ की भी इक हस्ती है,


लाख जमाना हो डिजिटल युग का, 

पर छोटे कस्बों और गलियों में, 

अब भी प्रेम पत्रिका साझा करके, 

जब गुपचुप बातें होती है, 

तब न जाने क्यों दिल से मेरे, 

आवाज इक एसी उठती है, 

कि आज भी प्रेम कहानियाँ, 

बस कागज़ पर ही जंचती है, 

हाँ मानव की इस बस्ती में, 

काग़ज़ की भी इक हस्ती है,


फटा पुराना हो जाता जब, कहते सब यह पस्ती है, 

बनकर रद्दी मिट जाता जब, देता है संदेश यही, 

रे इंसान छोड़ गुरूर का चोला तू, 

कि इक दिन सबकी हस्ती मिटती है, 

कर ले खुद को काग़ज़ जैसा, 

लाख जमाना तोडे़ जिसको, 

बनकर कोरा कागज़ लेता फिर नव निर्माण, 

टूट बिखरकर भी न मिटती, 

एसी ही कुछ काग़ज़ की हस्ती है, 

हाँ मानव की इस बस्ती में, 

काग़ज़ की भी इक हस्ती है



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