जतन
जतन
रेगिस्तान में कभी अकेले ही फूल चुने हैं..!!
फूलों के बीच कभी हमने कांटे भी तो गिनें हैं..!!
क्या कहें ए जिंदगी..
तेरे लिए हमने कितने जतन किए हैं..!!
अपने सपने मिटा के तेरे लिए खुशियां बुने हैं..!!
तेरी सच्चाई के आगे अपने अरमानों को भी भुने हैं..!!
क्या बतलाएं तुझे ए जिंदगी..
तेरे लिए हमने कैसे कैसे जतन किए हैं..!!
आँखों से छलकते मोती अपने दामन में समेट लिए हैं…!!
तुझे उजाला देने के लिए चुप के अंधेरे से भी तो लिपट गए हैं..!!
क्या बयान करे तुझसे ए जिंदगी..
तेरे लिए हमने ऐसे कितने जतन किए हैं..!!
कम न हो तेरी मुस्कान...इस लिए अपने होंठों पे मुस्कान रख दी है…!!
तुझे जिंदा रखने के लिए ए जिंदगी...हमने अपनी सांसें भी तुझे ही दे दी है..!!
अब क्या जतन करें तुझसे ये कहने को ए मेरी जिंदगी..!!
तेरे लिए हमने जाने अनजाने में...कैसे और कितने जतन कर लिए हैं..!!
