ज़िंदगी
ज़िंदगी
बचपन का जमाना
खुशियों का खजाना।
ना पता सुबह या शाम का
ठिकाना था।
थक कर आना
वापस स्कूल से बारिशों का
कागज की नाव।
क्यों हो गए हम इतने बड़े
न शांति या विश्राम
न खुशी या खेलकूद।
लड़ना, पीटना या लूटना
किसे कैसे फ़साना
या धोखा देना।
मासूमियत नहीं,
हमेशा डरना।
अन्तः में मरना
यही हैं ज़िंदगी।
