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इश्क का पाठ

इश्क का पाठ

1 min 300 1 min 300

न जाने सुहानी सी डगर

तुम मिली तो मगर

वो चमन सा बहार

वो हल्की बूंदों की बौछार

वो अपनो का एहसास

न जाने सुहानी सी रात

मानस के मानस की आवाज

तुम बन गई इश्क का एहसास

न जाने सुहानी सी रात

हम बुलाते रहे, तुम छुपते रहे

तुम हँसते रहे, हम सुलझते रहे

तेरी मुस्कान रही, मेरी पहचान रही

न जाने मेरा अरमान रहा

तेरा एहसान रहा

न वो रात रही, न वो बात रही

रही तो एक सुहानी रात रही।


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