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Shagird Sinha

Abstract Fantasy

4.1  

Shagird Sinha

Abstract Fantasy

इकतारा

इकतारा

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दरवाज़े पर किसी की दस्तक हुयी,

पीछे चिमनी थी सो कमरे के अंदर

पहले उसकी लंबाई की दुगुनी परछाई

दाख़िल हुयी


कमरे में स्याह अंधेरा था

बशर्ते कि फर्श पर दरवाज़े की माप

की धुँधली रोशनी थी

वो भी चिमनी की


कुछ बटोर लेने की आशा से

मुट्ठी बाँधता, सिवाय जमीन पर 

नाखूनों के रगड़ने की कर्कस 

आवाज़ आती.........


एक फ़क़ीर सर्द रातों को रोज़

बैचेन करता

हलक तक आती कोहरे की हवा

पलकों और पके दाढ़ी पर शबनम की बूँदें 

गोया मोती


साँस संकुचन की अवस्था में 

सहसा

एक लंबी खाँसी फेफड़ों में उछलती

मुँह के ढ़क्कनों से सफेद धुँआ

आभाषित आकाश को चकमा देती हुयी

गायब हो जाती..........


एक गाँव में, जिसका अंतिम छोर तलहटी

से सटा हुआ

जहाँ सूरज खिड़कियों में ही

डूब जाता

'इकतारा' हाथ में थामे और एक

लंबी आवाज़

"कहत कबीर सुनो भाई साधो.........." 


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