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कृष्ण धत्तरवाल

Abstract

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कृष्ण धत्तरवाल

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होली है

होली है

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 होली है होली है

रंगो की आंख मिचौली है


सूर्य ने प्रचंड रूप लिया

फागुन ने ली अंगड़ाई

मानव मन हर्षित हो गया

जब रंगों की वेला आई


प्रातःकाल उठकर बच्चे

खुश हो जाते हैं

जब एक दूसरे को

वो रंग लगाते हैं


खुशियों की ये पावन वेला

जब आ जाती है

बच्चे हो या बूढ़े सबमें

मस्ती छा जाती है


गहरे रंग जैसे रिश्ते

यहां कायम हो जाते हैं

गिले-शिकवे भूलकर

हम जब गुलाल लगाते हैं


इसके पीछे भी एक

पोराणिक कहानी है

भगत प्रल्हाद की ये

भक्ति की निशानी है


असुर हिरण्यकश्यप ने

होलिका को बुलाया

भगत प्रह्लाद को मारने

का षड्यंत्र रचाया


होलिका को वरदान था

शरीर न जलने का

प्रह्लाद बैठाकर गोद में

मौका न दिया संभलने का


भक्ति में कितनी शक्ति है

यह पता चल गया

होलिका का शरीर

अग्नि में जल गया


बुराई का अन्त हुआ

अच्छाई ने ली अंगड़ाई

सभी ने खुश होकर

आपस में धूल उड़ाई


होली है होली है

रंगों की आंख मिचौली है।



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