हे प्रिये
हे प्रिये
हे प्रिये ,
मैं,
नहीं कह सकी,
तुम्हें कभी ,
""हे प्रिये""।
परंतु,
कहना चाहती हूं,
आज तुम्हें...
""हे प्रिये"" ।।
मैने ,
मैने दशकों से ,
अपने हृदय के भीतर ।
तुम्हारे लिए ,
जो मेरा प्रेम है,
छुपा रखा है ।।
जैसे ,
कोयले की खान में ,
कोई हीरा छुपा लेता हैं।
और
समय आने पर ,
वह उजागर हो जाता है।।
ये
वही समय है ,
" प्रिये " ।।
जब ,
मैं तुमसे ,
साझा करूंगी ,
अपनी ,
असीमित भावनाओं को ,
मैं ,
कभी नदियों सी,
धारा प्रवाह बहुंगी ,
और,
बहती चली जाऊंगी ।।
कभी तो ,
बांध लूंगी,
खुद को ,
समाज के ,
सामाजिक ,
रीति रिवाज़ो में ।।
और ,
कभी ,
तोड़ दूंगी,
सारे बंधन
सिर्फ ,
तुम्हारे प्रेम के लिए ।
कभी न,
तुममें खोकर ,
मैं ,
खुद को भुला दूंगी ,
और डूब जाऊंगी,
तुम्हारे ,
प्रेम की गहराइयों में ।
कभी,
तुम्हारी आंखों का ,
इतना ज्यादा नशा करूंगी ,
की सिर्फ ,
हमारा प्रेम ही ,
अफ़ीमी लगे।।
तुम्हारी ,
शहद से मीठी बाते ,
जिसका,
मुझे चस्का लगा है ,
की दुनिया की ,
सारी सट्टे बाज़ी बेकार ।
सनम,
जब से ,
हमने हमारा दिल,
दिया तुझ पर वार ।।
""हे प्रिये ""
तुम्हे मैं बताऊंगी ,
की तुम ,
मेरी सुबह का ,
पहला खयाल हो, ।
और ,
जिसे मैं ,
नींद में भी ,
खुद से ,
जुदा नहीं कर पाती हूं,
तुम,
मेरे वो ख्वाब हो ।।
तुम कैसे ?
मेरे साथ –
उठते ,बैठते ,
चलते ,फिरते ,
नाचते ,गाते हो ।
तुम ,
मेरा दुःख नहीं बांटते,
न ही हंसाते हो,
क्योंकि ,
तुम ,
मौजूद ही नहीं होते कभी,
पर ,
साथ मेरे ही,
रह जाते हो ।।
""हे प्रिये ""
हर सुबह ,
मैं भी ,
भारतीय पत्नी की तरह ,
तुम्हारे हाथों में ,
चाय का कप पकड़ाती हूँ।
सज धज कर
सिंदूर ,
तेरे नाम का लगाती हूँ ।
ब्रेक फास्ट,
लंच ,डिनर प्यार से पकाती हूँ ।।
तू ,
जब घर से ,
निकलता है तो
""अच्छा सुनो न ""
,कहकर
तुम्हे पुकारती हूंऔर ,
बाल तेरे सहलाती हूं।
बिन तेरे है ,
भोर अधूरी,
बिन तेरे ,
हर शाम है फीकी ।।
घर को जो तू ,
लौट के आए तो,
बाहों में तेरे सो जाती हु।।
"हे प्रिये "
"सुनो ना "
मैं,
तुमसे
बहुत कुछ कहना चाहती हूं
दशकों से ,
जो कभी कहा नहीं...
तुम ,
जीवन का ,
सबसे खूबसूरत अहसास हो।
तुम जान हो,
तुम प्रेम हो ,तुम स्वास हो ।
जो कभी ,मुमकिन ही न हो सका ।
तुम,
वो अधूरी प्यास हो।
मेरी रूह में ,
जो कसक उठती रही सदा,
तुम वहीं ,
प्रेम की आवाज हो ।
जो कभी ,
पूर्ण ना किया जा सका,
तुम वहीं,
आत्मा के ,
प्रेम का आगाज़ हो ।
तुम जीवन हो,
तुम सृष्टि हो
तुम विरहन हो ।
जिसके लिए मैं,
तड़पती हु,
तुम वो रंग हो ।
जिसके लिए,
सदा हाथ उठता है ।
तुम वो प्रार्थना हो,
दुआ हो ।
तुम्हारे चरणों में ,
अपना सर क्या??
मैं संपूर्ण,
स्वयं समर्पित हूं।।
""हे प्रिये ""
तुम ,
मेरे भगवन हो
""हे प्रिये ""
""तुम मेरे भगवन हो ""
और,
ये सब ,
प्रिये
कहना है तुमसे...
कहना है ,
मेरी दर्द ,
मेरी तकलीफ ।।
जो ,
किसी ओर का
तुम्हे पाकर
मैं महसूस करती हु।।
कहना है ,
जो तुम्हे,
किसी और की ,
बाहों में देख,
मैं,
कैसे मरती हु।।
और
ऐसे तिल तिल मरने ,
और,
तुमसे ,
""अन्नत प्रेम करने" ,
का विवरण ,
तुम्हे,
विस्तार पूर्वक कहना है।
हे प्रिये ,
ये मेरा ,
प्रेम पत्र मुझे
तुम्हें ,
समर्पित करना है।।

