STORYMIRROR

श्रुति श्रीवास्तव

Abstract

3  

श्रुति श्रीवास्तव

Abstract

हे हरि तेरे द्वार पे हूं , किवाड़ खटखटाएं कैसे।।

हे हरि तेरे द्वार पे हूं , किवाड़ खटखटाएं कैसे।।

1 min
290

भरी है कालिख

दीप जलाऊं कैसे

हे हरि तेरे द्वार पे हूं

किवाड़ खटखटाएं कैसे।।


कुछ मुझे नहीं छोड़ती

कुछ मैं नहीं छोड़ पाती

क्रोध, अज्ञानता, बेसब्री

भरे नयन

तेरा दर्शन कैसे पाऊं

हे हरि तेरे द्वार पे हूं

किवाड़ खटखटाएं कैसे।।


एक प्यास है तुम्हें जानने की

एक आस है ‌तुम्हें पाने की

पर फैला यह भ्रम जाल

मैं और मेरा

जीत-हार-जीत की लत से 

बच कर 

तुझमें खोने का आनंद पाऊं कैसे

हे हरि तेरे द्वार पे हूं

किवाड़ खटखटाएं कैसे।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract