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J P Raghuwanshi

Comedy

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J P Raghuwanshi

Comedy

"हास्य व्यंग"

"हास्य व्यंग"

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ऐसे कैसे!कवि,

जबरन गीत सुनाते हैं।

नहीं सुनते यदि श्रोता,

दादागिरी बताते हैं।


शब्द तो मिलते नहीं,

हंसते और हंसाते हैं।

उनकी हरकतो से,

हम तो तरस खाते हैं।


न तो भाव होते हैं,

न तो शुद्ध विचार।

धर्म नीति छोड़ी,

छूट गया आचार।


मैं सुन रहा था,

और गुन रहा था।

बैठा था अनुशासन में,

पर मन रो रहा था।।


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