हां स्त्री हूं
हां स्त्री हूं
शांत तो सती हूं,
रौद्र तो काली भी हूं,
रक्षा के लिए बनती दुर्गा भी मैं ही हूं,
और कभी विद्यादायिनी
सरस्वती भी कहलाती हूं,
हां मैं स्त्री हूं
शांत तो सती हूं,
रौद्र तो काली भी हूं,
जब मां लक्ष्मी कहकर घर
आने का तुम न्योता दे जाते हो,
फिर क्यूं घर की लक्ष्मी को
बोझ समझ बैठते हो,
जब देवी की उपाधि हीं दे देते हो,
फिर भी मेरे अस्तित्व को क्यूं नकारते हो,
हां मैं स्त्री हूं
शांत तो सती हूं,
रौद्र तो काली भी हूं,
चाहत नहीं की मुझे पूजनीय बना दो,
बस चाहती हूं इतना कि
संग कदम दो कदम चल लूं,
प्रधानता की कामना नहीं करती,
बस बराबरी की इक्षुक हूं,
हां मैं स्त्री हूं
शांत हूं तो सती हूं,
रौद्र तो काली भी मैं ही हूं।
