क्या कभी दिखा पाऊंगी?
क्या कभी दिखा पाऊंगी?
वो गांव की गलियों की मिट्टी,
और उसके चौराहों के कीचड़,
जिसमें बीता मेरा बचपन,
क्या कभी दिखा पाऊंगी मैं अपने बच्चों को?
वो पत्तों की सरसराहट,
और वो पंछियों का चहचहाना,
वो ओस भरे मैदान,
क्या कभी दिखा पाऊंगी मैं अपने बच्चों को?
वो घरों के आंगन,
जिसमें सब मिल हंस खा लेते थें,
और फ़िर वो गोबर के लीपन की ख़ुशबू,
क्या कभी दिखा पाऊंगी मैं अपने बच्चों को?
वो ताड़ के फलों की मिठास,
और कच्चे कैरियों की खटास,
और वो गांव के पोखर जिसमें हम यूंही कभी नहा आते थे,
क्या कभी दिखा पाऊंगी मैं अपने बच्चों को?
यह एहसास मुझे तब झकझोर गया,
जब मेरे नन्हे बेटे ने मुझसे पूछा;
" मां, गोबर के उपलों का रसोई में क्या काम?"
तब लगा ऐसे,
जैसे कि हम प्रगति के नाम पर,
प्रकृति से कुछ दूर से हो रहे,
आज कहां दिखलाऊं मैं अपने बच्चों को,
इस महानगर में अपने गांव की हरियाली,
अपने गांव की ख़ुशबू।
