हां ! मैं पागल ही हूँ
हां ! मैं पागल ही हूँ
हां ! मैं पागल ही हूँ
और मुझें यह ज़िंदगी पसंद हैं
ओ... जी !
जब मेरी स्वस्थ दिमाग थी
तब तुमलोगो ने नहीं देखा मुझे,
आज मैं पागली हूँ
तो देख के बड़ी हंसी अह रही है
भूल गए वो दिन
जब यह जान सिर्फ,
आये दिन लोगो के सेवा में लीन थी
भूल गए वो दिन
जब अन्याय के सामने
मेरे ही आवाज ऊँची थी
सिर्फ तुम लोगों के लिए
और आज तुम लोगों से मिलते है
पत्थर, जुटा, गालियां
अरे
स्वस्थ समाज के स्वस्थ लोगों
मेरे चीत्कार को समझने के लिए
पहले मेरे दर्द से वाक़ीब होना होगा
तुम लोगों ने ही तो मेरे सत मुझसे छीनी है
कहा रहूंगी कहां जाऊंगी यह भी नहीं सोचा
अब न मेरे कोई घर
न कोई रिश्तेदार
न कोई दोस्त
सिर्फ यह खुली रहे
और बेहिसाब धूल
हाँ ! मैं पागल ही हूँ।
