STORYMIRROR

Richa Pitliya

Abstract

4  

Richa Pitliya

Abstract

ग़रीबी

ग़रीबी

1 min
23.4K

कल तक पर्दे में था

अब सब सामने दिखता है


टूट गयी दीवारें

अब सब दिखता है


एक आम इंसान जब

तड़प कर भूख से मरता है


आँसुओं को कैसे रोकूँ

जब दिल का ज़ख़्म रिसता है।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract