STORYMIRROR

कवि गुलशन गुप्ता

Abstract

3  

कवि गुलशन गुप्ता

Abstract

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
185

वज्द में हूँ अभी सादगी से तिरी,

जुगनुओं सा हुआ रोशनी से तिरी,


आरजू है बहुत वस्ल की अब हमें,

मर न जाऊँ कहीं तिश्नगी से तिरी,


इश्क़ को तुम हमारे छुपाओ नहीं,

मैं गिरा हूँ बहुत डायरी से तिरी,


है लगा इश्क़ का रोग पहले पहल,

बाद रिश्ता जुड़ा जिंदगी से तिरी,


हर ग़ज़ल भी मिरी सिर्फ तुमसे बनी,

मैं लिखूंगा ग़ज़ल बस ज़मी से तिरी।



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

More hindi poem from कवि गुलशन गुप्ता

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min पढ़ें

पिता

पिता

1 min पढ़ें

Similar hindi poem from Abstract