एहसास
एहसास
एक एहसास ही तो हैं,
जो इंसान को इंसान से अलग करता है।
अच्छे को बुरे से उपर करता है,
ग़रूर को नेकी के नीचे लाता है।
ख़ुशी को ग़म से अलग करता है,
अंजान को भी अपना घर बनाता है।।
उस एहसास को समझने वाले लोग अक्सर
भीड़ में खो से जाया करते हैं,
हर एक एहसास को समझने की उम्मीद में
अक्सर पीछे रह जाया करते हैं।
बे- एहसास लोग उस भीड़ में आगे तो चले जाते हैं,
पर कुछ बहुत कीमती पीछे छोड़ जाया करते हैं।
वो हैं ज़िन्दगी जीने का एहसास,
जो अक्सर भीड़ में थम जाया करने वाले लोग ही कर पाते हैं ।।
मंज़िले तो सबके हिस्से का हक़ होती हैं,
पर एहसास की रौशनी के साथ मंज़िल तक पहुँचना,
सिर्फ कुछ ही लोग अपने हक़ में लिखवा पाते हैं।
