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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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दोहा

दोहा

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कहें सुधीर कविराय- दोहा छंद  ******* पूजित प्रथम गणेश जी,  नहीं रहा क्या ध्यान। मानव में नित बढ़ रहा, स्वार्थ और अभिमान।। श्री गणेश भगवान जी, करिए आप उपाय।                    पाप धरा पर बढ़ रहा, कोई  नहीं  सहाय।। इतना नहीं कठोर भी, बनकर  रहिए  आप।         जो बन जाए एक दिन, बिना दोष अभिशाप।। जिनके भी हैं माँ, पिता, अभिभावक के रूप। ईश्वर की महती कृपा, सचमुच  बड़ा  अनूप।। होना चाहो यदि सफल, कीजै अथक प्रयास। अंत समय तक छोड़ना, नहीं कभी भी आस।। उहापोह  से निकलकर, जिनको  है  विश्वास। कभी व्यर्थ जाता नहीं, उनका सतत प्रयास।। गंजा कंघी कर रहा, इसमें छुपा है सार। नहीं बैठता व्यर्थ में, नाहक  ठाने  रार।। उम्मीदों के संग में, करता नियमित कर्म। भले बाल सिर में नहीं, कंघी तो है धर्म।। तन्हाई में काटते,  मातु-पिता दिन रात। फुर्सत में बच्चे नहीं, कर पाते दो बात।। नाहक  ही  क्यों  दे  रहे,  तन्हाई  का  दोष। उसको तो खुद आ रहा, अपने ऊपर रोष।। आज मनुज की भावना, कुंठा से भरपूर। गैरों  से  रिश्ता  रहे,    अपने  होते   दूर।। मरती  जाती  भावना, व्यर्थ  लगे  उपकार। मानव  प्राणी  दंभ  में,  भूला   शिष्टाचार।। श्रेष्ठ भावना  छोड़कर, जहर  घोलते  लोग। हम लोगों के सामने, फैल  रहा  यह  रोग।। ऊपर यारी भावना, भीतर  कुटिल  विचार। जाति-धर्म के  नाम पर,  होते  अत्याचार।। क्या विकास से मिल रहा, जनता को सुख-चैन। देखो   कितने   हँस   रहे,  कितने   भीगे   नैन।। निज विकास की आड़ में, होता जैसा खेल। बेबस  जनता  क्या  करे, बनी  हुई  है रेल।। एक्सप्रेस वे का बढ़ रहा, आज नित्य ही जाल। यह विकास कि नाम है, या कल  का जंजाल।। घातक शस्त्रों का बढ़ा, अब तो नित्य विकास। और युद्ध  की  आड़  में, जग का  सत्यानाश।। यह विकास का आइना, कुछ लोगों के नाम। नाहक  करते  युद्ध  हैं,    भले  हुए बदनाम।। नेताओं का हो रहा, अपना  खूब  विकास। जनता केवल पा रही, झूठ-मूठ की आस।। मौसम देता बहुत दुख, जाने क्यों इस बार।  या विकास निज दे रहा,  नये रूप में धार।। तपन संग इस बार क्यों,  बदला  गर्मी  रंग।  तूफां, वर्षा अरु उमस,  से  हम  होते  दंग।। बेकाबू अब प्रगति  से,  मौसम  भी  बेचैन।  देख  नहीं  हम  पा  रहे, भीगे  उसके  नैन।। जहर बढ़े नित प्रकृति में, मौसम का क्या दोष।  उसके  भीतर  जो  भरा, वही  उगलता  रोष।। मौसम ने भी कर लिया, अपना खूब विकास।  जैसे  हम-सब  काटते,  हाथ कुल्हाड़ी घास।। सत्ता में  जब  आ  गये, हैं  शुभेंदु  सरकार। टीएमसी में हो रही,  जमकर  के  तकरार।। घुसपैठियों के उड़े, अब सारे सुख चैन। ममता दीदी रो रही,  दोषी  मानें  नैन।। योगी माडल छाप है, अब  शासन  बंगाल। गुंडे  सब  बेचैन  हैं,     काटे  कैसे  जाल।। बच्चे ने दिखला दिया, अब अपनी औकात। निकलो बिल से तो जरा,  करो गर्व से बात।। कमल खिला है संग में, बदल गया सब रंग। बुआ भतीजा छोड़िए, सभी  विरोधी  दंग।। दिल्ली तक हल्ला मचा, छाया योगी रंग। ये शुभेंदु सरकार है,  ममता रँग में भंग।। नित  नूतन  अभ्यास से, और सफलता पास। उतनी हम करते नहीं, खुद से जितनी आस।। जो करते अभ्यास हैं, उनसे सीखो आप। राग बेसुरा छोड़िए, बना  यही  है  पाप।। अपनों के आघात का,   होता गहरा घाव। जिनको हम देते रहे, सबसे ज्यादा भाव।। सोच समझकर जो नहीं, करते हैं आघात। आता उनके हाथ है, केवल आलू  भात।। मेघनाद ने  जब किया, लक्ष्मण  पर  आघात। तब ही निश्चित हो गया, होगा अब प्रतिघात।। राजनीति के खेल में, नित होते आघात। घूम-घूम नेता कहें,   झूठी  सारी  बात।। ओला, वारिश से लगा,   कृषकों को आघात। नहीं समझ सकते सभी,  कैसा ये  प्रतिघात।। मातु-पिता  को  दे  रहीं,   संतानें  आघात। बेबस  बेचारे  बहुत , बस रोते  दिन-रात।। बदल गया आघात का, आज बहुत ही रंग। जितना  भी हम  सोचते, उतना  होते दंग।। हर प्राणी अब द्वंद्व में, फंसता रहता रोज। बड़ी जरूरत आज की, राहें नूतन खोज।। उल्टा अर्थ निकालते, आज मतलबी लोग। आज समय का देखिए,  बनते जाते रोग।। यदि अनर्थ हो चाहते, रखो तभी  तुम बात। सबको ही तो है पता, अपनों  का उत्पात।। अपनी सुविधा से सभी, करते अर्थ अनर्थ। मैं मूरख क्या ही कहूँ, बात जुबानी व्यर्थ।। आज अर्थ का दौर है, सबका अलग हिसाब। कुछ तो  गड्ढे  भर  रहे, कुछ  खोदे  तालाब।। बिना अर्थ के आपको,     नहीं मिलेगा भाव। अच्छा है चुपचाप ही, सहलाओ निज घाव।। आया  लेकर  नौ तपा,    गर्मी  बड़ी  अपार। अब बादल बरसात की, सूखा को दरकार।। आ बादल बरसात ले, सूखा  है  बेचैन। भीषण गर्मी नौ तपा, मायूसी दिन रैन।। निद्रा से बाहर निकल,  धरती  करे  पुकार। हरियाली चहुँदिश करो, छोड़ो अपनी रार।। धरती करे पुकार नित, बनो नहीं मदहोश। हो जाओगे एक दिन, बिन  मेरे  खामोश।। देख-देख निज दुर्दशा, धरती करे पुकार। बेशर्मी  से  कर  रहे, मेरा  आंचल  तार।। वृक्षारोपण आड़ में,  गमलों की भरमार।         हरियाली का है यही, सत्य सार संसार।। पेड़  काट  करते  रहें, हरा  भरा संसार।                     यही हमारे प्राण का, नूतनता आधार।। पेड़  लगाना  चाहिए,     क्यों  करते  तकरार।           जाना सबको एक दिन, आखिर यम दरबार।। आसन-वासन व्यर्थ है, भूखा  प्राणी  पेट। बिना पेट होता नहीं, कभी किसी से भेंट।। मान और सम्मान से,  आसन दीजै आप। मातु-पिता आशीष से, मिटते हर संताप।। नित्य क्रिया के बाद में, अपने आसन बैठ। ईश साधना संग में,  करें  योग  की  पैठ।। दीवाने  बनिए  सदा, मातु-पिता के साथ।  नहीं आपका वे कभी, छोड़ चलेंगे हाथ।। दीवाने  कुछ  जगत में, करें  अजूबा  काम।  भले आप हम कह रहे, चाहत केवल नाम।। दीवाने  जो  कर्म  के,    चलते  रहते  राह।  मिले सफलता एक दिन, पाते वे ही वाह।। दीवाने  कहते नहीं,  कभी  आप  कमजोर।  अलग बात है यह मगर, करें नहीं वो शोर।। हम  भी  तो  यमराज  के, हैं  दीवाने  खूब।  डर हमको लगता नहीं, आप कह रहे डूब।। व्यर्थ छलावा मत करो, मानो मेरी बात। कल में ये ही आपको,  पीड़ा देगी तात।। आप छलावा कर भला, रहे तीर क्या मार। अपने  जीवन  के  लिए, रोप  रहे हैं  रार।। नहीं छलावा काम का, क्यों बनते नादान। तुमसे अच्छे वे सभी,  बनते  नहीं  महान।। मातु-पिता को भूलकर, किया छलावा खूब। आज याद क्यों आ रही, नाव रही जब डूब। आज छुड़ाना चाहते, मातु-पिता का साथ। कल कोई होगा नहीं, जो पकड़े तव हाथ।। परहित  का  संदेश  नित,     देते  प्रिय  यमराज। बिना स्वार्थ के कर रहे, निशदिन अपना काज।। परहित धर्म विहीन है, समझो इसका सार। मानवता को भूलकर, ठान रहे  क्यों  रार।। पर्यावरण से  सीखिए, करना  सम  व्यवहार। परहित की बस भावना, माने निज आधार।। परहित जिसकी भावना, उसके नेक विचार। पर पीड़ा  उसको  स़दा, देती  कष्ट  अपार।। धन दौलत से है बड़ा, परहित का संसार। इससे उत्तम  है नहीं, बड़ा  ईश  दरबार।। अब धरना है बन चुका, महज आज खिलवाड़। अपने हित की आड़ में,  बना  रहे  तिल  ताड़।। शाँति प्रदर्शन हो जहाँ,  मिल पाता तब भाव। यदि  हिंसा  इसमें  हुई,   नाहक  देता  घाव।। युवा  हमारे  दे  रहे,    आज   विश्व   संदेश। उन्नति पथ पर सतत ही, आगे भारत देश।। आंदोलन की आड़ में, होते कुत्सित खेल। जाति-धर्म के  संग में, देशद्रोह  की  रेल।। जैसा  जिसका  कर्म  हो,   वैसा  ही  आयाम। समझें सब परिणाम का, होता कितना दाम।। हर  प्राणी  तो  इन  दिनों, होता  है  बीमार। क्योंकि है बिगड़ा हुआ, खानपान आधार।। जान बूझकर हो रहा, आज  मनुज  बीमार। क्योंकि भूला जा रहा, जीवन का जो सार।। हृदय  आप सर  सा रहे, स्वर में हो रसधार। शर की नाहक कल्पना, प्राणी का हो सार।। काम करो सब बाद में, पहले मनन विचार। तभी  सफलता  हाथ  में,   आए  बारंबार।। बिना मनन के आपको, मिलता जो परिणाम। उससे मिलता  है नहीं, श्रेष्ठ  सुखद आयाम।।  कहाँ लोग अब कर रहे , मंथन मनन विचार। खुद को कहते हैं प्रभो, भूले  निज  संस्कार।। कभी किसी की राह में,  बनो न तुम दीवार। प्रेम-प्यार सद्भाव से, रखिए निज व्यवहार।। भाई-भाई  मध्य  में,        खड़ी  हुई  दीवार। मातु-पिता असहाय हैं, शेष नहीं अधिकार।। अब रिश्तों के बीच में, बनती  नव  दीवार। यही आज का सत्य है, सबसे भारी भार।। आज न्याय का बात तो, करते हैं सब लोग। अपना  स्वारथ  सोचते, दूजा  चाहें  भोग।। भला कहाँ  हम मानते, ईश्वर  का  आभार। जबकि इस संसार का, वही एक आधार।। अपने हित में ही सही, हम सब करें विचार। धन्यवाद  आभार  का, झूठा  नहीं  प्रचार।। सदा   हमारा   कर   रहे,   दिनों   रात  आभार। मम प्रियवर यमराज का, अद्भुत अनुपम प्यार।। कच्चा पक्का कुछ नहीं, आज मानते लोग। यही  हमारे  बीच  में, आज  बड़ा  है  रोग।। कच्चा आम को पीसकर, चटनी खाई खूब। अमिया  खाई  नमक से, घूमे  मस्ती  डूब।। नेता पक्का है वही, जिसको मौसम ज्ञान। पारा बदले समय पर,  जैसे आए तूफान।। कच्चा  मेरा  पुत्र  है,      मैं  तो  पक्का  यार। कुर्सी अपने बाप की, करे  व्यर्थ  क्यों  रार।। कच्चा पक्का चक्र में, फँसे रहे जो लोग। उनके जीवन से कभी, मिटा नहीं दुर्योग।। करें आत्म चिंतन सभी, मिले सुखद परिणाम। उम्मीदों  से  भी  बड़े,      मिलते  हैं  आयाम।। ललना  पलना  में  नहीं, कल  जैसा  संबंध। बीते दिन जो था मधुर,  अब लगती है गंध।। कहना कितना मानते, जान  रहे हम  आप। मातु- पिता कुछ भी कहें, लगता है संताप।। बहना  आती  द्वार  जब, लगती  है  मायूस। मातु-पिता बिन मायका, हृदय रहा है धूस।। ममता की ममता छिनी, रहती सदा अधीर। ईश्वर  की  होगी  कृपा, तभी  दूर  हो पीर।। बिटिया  सी  मुझको  लगी,  हुई  हमारी  भेंट। बिना बात जब तब सदा, हँसकर देती  फेंट।। निंदा नफ़रत संग में, भूल गए प्रभु नाम। होश आज आया मुझे, बीती उम्र तमाम।। खड़ा पुकारे  द्वार  पर, लेकर मेरा नाम। कहा प्रिए यमराज ने, बीती उम्र तमाम।।   अब तो अंतिम समय है, याद करो मत राम। आखिर क्या करते रहे, बीती  उम्र  तमाम।। बीती  उम्र  तमाम  जब,     तब करते हो  याद। संग चलो यमलोक अब, तब करना प्रतिवाद।। अंतिम पल में आ रहे, याद बहुत क्यों राम। बीती  उम्र  तमाम  जब,  लेते  ईश्वर  नाम।। लोभ- मोह  के   चक्र  में,    बीती   उम्र   तमाम।  शेष  समय  है जो  बचा, ले लो  प्रभु का  नाम।। समय चक्र के फेर में , भूल गए हरि नाम।  बीती  उम्र  तमाम  तब, रटते  सीताराम।। गुस्से में यमराज ने, किया  मुझे बदनाम। पापी जीवन क्या किया, बीती उम्र तमाम।। नाहक   पंगा  ले   लिया,    अंजाने  में  यार। नहीं ध्यान मुझको रहा, अब योगी सरकार।। हर्ष  बाँटना  आज अब, भूल  रहे  हैं  लोग। सच मानो यह बन रहा, पुष्पित होता रोग।। गुरू  चरण में  शीश  धर, मिले  भक्त को  ज्ञान। मिट जाता मन में बसा, सब उसका अभिमान।। देते  सब  उपदेश  हैं, बिना जान  पहचान। नहीं जानते क्या भला, करा रहे अपमान।। सत्य सनातन का अमर, सदियों  से  संबंध। कुछ लोगों को आ रही, नाहक इससे गंध।। प्रकृति निरूपण कर रही, हरा-भरा  संसार। मूरख बन हम खोदते, अपना  ही  आधार।। आज  विखंडित  हो रही, संबंधों  की डोर। मानव मन के भेद का, नहीं ओर या छोर।। गौरी  पुत्र  गणेश  का,   मान  दिवस  बुधवार। प्रथम पूज्य को मानते,  सुखदा  जीवन सार।। आप  पुरातन  पंथ  का,   उड़ा  रहे  उपहास। इसके पीछे का हमें, मकसद दिखता खास।। लटक रहे अब अधर में, शिक्षा लेकर आज। युवा  बहुत  कुंठित  रहें, कैसे  होगा काज।। कहा मित्र यमराज ने, जिंदा हो प्रभु आप। मैंने भी समझा दिया, यही  हमारा  पाप।। जिंदा  होकर  कौन  सा,   तीर  मारते  लोग। जिनका जीवन आप ही, बना हुआ है  रोग।। दुखी बहुत  करने  लगा,  मम प्रियवर यमराज। लगता उसके पास अब, और नहीं कुछ काज।। बिना डरे  आगे बढ़ो, तब ही  मिले  प्रकाश। यदि मन में संशय नहीं, रहता  दूर विनाश।। जीवन में पितु-मातु के, बनो रोशनी आप। इससे  सुंदर  कुछ  नहीं, दूर  रहे  संताप।। अंधकार  से  कीजिए,  बढ़कर  दो-दो  हाथ। तभी मिलेगा आपको, चमक उजाला साथ।। बढ़ी प्रभा रवि की किरण, देती  नव  संदेश। सदा आप  चलते  रहें, जैसा  भी  परिवेश।। चमक दमक में जो फँसा,  रहा दंभ में चूर। निश्चित जानो  एक दिन, रोता  है  भरपूर।। आभा मंडल में कभी, फँस मत जाना आप। देखो पीछे  क्या छिपा, प्रेम  प्यार  संताप।। आभा  धूमिल  हो  गई, सबने  देखा  बंगाल। शहंशाह जो कल रहे, उनको आज अकाल।। भरे  पेट वे  छाँव में, बजा  रहे  हैं बीन। भूख, प्यास से रो रहे, बेचारे जो दीन।।  भूख-प्यास  से  मर  रहे,     दीन-हीन    लाचार। कोशिश कितनी है सफल, समझ रही सरकार।। भूख-प्यास उनकी मिटे, जिनकी है दरकार। दीन-दुखी क्या जानते, होता  क्या  संसार।। मस्ती में  हाथी  चले, देता  नहीं  है कान। चाहे जितना भौंककर, राह रोकते श्वान।।  लक्ष्य  साधना  चाहते, जाओ  उसमें  डूब। बाधा कुत्ते बन सकें, कोशिश होगी खूब।। हाथी  हमको दे रहा, छोटी सी ये सीख। कुत्ते  रोकेंगे  बहुत,  जैसे  माँगे  भीख।। कुत्ते  चाहें  भौंककर, गज  की  रोकें  राह। पर वो मस्ती में चले, बिना किसी परवाह।। हास्य रसीला चूसकर, गाओ गीत कमाल। लाठी ताली संग में, जमकर करो बवाल।। हास्य सार जो जानते, समझ रहे वो खाद। ज्ञान हीन जो लोग हैं,   वे सब हैं बरबाद।। हँसी-हँसी में कह गए, बात बड़ी अनमोल।   जो समझे  वो तर  गए, बाकी  पीटें  ढोल।। हास्य जगत के आज हैं, कविगण सब बेकार। भला  मित्र  यमराज  से,  कौन  करे तकरार।। नाम मित्र यमराज है, आज हास्य सम्राट। जो भी आता सामने, उसकी उल्टी खाट।। सजा मंच यमराज का, बैठे  लेकर   हास। फेंट रहे हैं चुटकुला, खिला  रहे हैं घास।। अब तो अपने लोग भी, करते झूठी बात। सकुचाते बिल्कुल नहीं, करने में आघात।। मानव मन में बढ़ रहा, अब जहरीला भाव। ऐसा देता आघात है, मिटे  कभी न भाव।। अब सकुचाते हम नहीं, करने में आघात। कहाँ सोचते हैं भला,  कल खायेंगे लात।। मातु-पिता पर हो रहे, आए  दिन आघात। कौन  समझता वेदना, रोते वो दिन-रात।। प्राण   प्रतिष्ठा   हो   गई,    मंदिर   में   श्रीराम। आज जगत में बस गया, अवध नाम आयाम।। प्राण प्रतिष्ठा संग में,  अवध में भारी भीड़।  बालरूप श्रीराम जी, मुस्काते निज नीड़।। भक्ति-भाव  से हो  रहा,  पूजन  अपने  राम। कितने वर्षों बाद अब, मिला प्रभो को धाम।। उत्साहित था विश्व भी, जागा नव विश्वास। प्राण प्रतिष्ठा  बाद अब, पूरी होगी  आस।। नहीं आप हम जा सके, भले अयोध्या धाम। प्राण प्रतिष्ठा ज्यों हुई,   मन बोला श्री राम।। कोई  होता  है  नहीं,  सभी  क्षेत्र  में  दक्ष। फिर भी कहते लोग हैं, प्रश्न बड़ा है यक्ष।। दक्ष अगर बनना हमें, करो सतत निज कर्म। मगर  भूलना  है  नहीं, जो  है  अपना धर्म।। चमक दमक के फेर में,  उलझ रहे हैं लोग। जानें क्यों नित बढ़ रहा, है समाज में रोग।। खान-पान से  दिख  रहा, चेहरों  का अब रंग। चमक मनुज की हो रही, समय साथ बदरंग।। काया मेरी  स्थूल है,  पर  मन  में  उत्साह। जीवन जैसा चल  रहा, उत्तम लगती राह।। तीर सधा दृग मीन के, लक्ष्य  वही  था एक।  और नहीं इसके सिवा, चलता रहा विवेक।। तीर सधा दृग मीन के, लक्ष्य वहीं था एक।  और नहीं इसके सिवा, चलता रहा विवेक।। मीन आँख को लक्ष्य कर, छोड़े अर्जुन तीर। जीत स्वयंवर द्रौपदी, मिटी द्रुपद  की पीर।। नेताओं   में  अब  नहीं,  बचा  दिखे   ईमान। कल थे  खड़े  विपक्ष में,आज पक्ष की शान।। नेता जी मेंढक बने, खूब उछलते आज। जहाँ मलाई की जुगत, वहीं करेंगे राज।। चारा मीठा जब मिले, हम तो हैं उस ओर। भले शाम हम थे वहाँ, यहाँ  खड़े हैं भोर।। सेवा  करने  के  लिए,   मेवा   की   दरकार। बिन मतलब अच्छा नहीं, बंद करो तकरार।। मिलने आई आज वो, संग सखा यमराज।  शीश झुकाया प्रेम से, पहनाया भी ताज।। दुर्घटना  ऐसी  हुई,    शब्द  हुए  सब  मौन। आप सभी हम जानते, दोषी इसका कौन।। दिल्ली घटना से नहीं,  लिया गया कुछ सीख। अब लखनऊ में दी गई, मुफ्त मृत्यु की भीख।। दुर्घटना  के  नाम  पर,  लीपापोती  रोज। हत्या करके शान से, बिना शर्म के भोज।। चौदह  बच्चे  काल  के,  नहीं  बने  हैं  ग्रास। कुछ लोगों ने स्वार्थ में, दिया मौत का पास।। पाला-पोसा  व्यर्थ  में, मानें अब  पितु-मात।  पता नहीं था एक दिन, मिलनी ये सौगात।।   पाला-पोसा कष्ट से, आज मिली मुस्कान। ईश्वर  की  महती  कृपा, बच्चे  देते  मान।। रात घनेरी  बीतकर,  आया  उदय  प्रभात।  किरणों ने हँसकर कहा, नूतन ये सौगात।।  गिरकर उठना  सीखना, होता सच्चा ज्ञान।  हार-जीत के साथ ही, उदय दीजिए मान।।  उदय अभी सूरज हुआ, लेकर  नवल प्रकाश।  तम को सारा मेट  कर, दमक उठा आकाश।। सुधीर श्रीवास्तव  


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