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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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मुक्तक

मुक्तक

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दोहा मुक्तक  ******* योग दिवस  ****** छाया है इस वर्ष भी, योग दिवस का शोर। हर मुख पर मुस्कान है, भीतर  नाचे  मोर। एक दिना के खेल से, भले मिले नहिं लाभ- फिर भी होता विश्व में, चर्चा  तो  पुरजोर।। मोदी  जी  ने  दे  दिया,   खूब  योग  विस्तार।  मम प्रियवर यमराज भी, अब मुरीद सरकार।  योग- रोग को भूलकर, सेल्फी  खींचो  मित्र -            डालो सोशल मीडिया, लाइक  मिले हजार।। योग साधना अस्त्र के, ध्वज वाहक हम आप। कोशिश  थोड़ी  कीजिए,   दूर  सभी  संताप। मोदी  जी की  आड़ में, मत  करना  अहसान- जो  भी  करना  कीजिए, चाहे जितना पाप।। जीवन  भर  है  आपको,   रहना  अगर  निरोग। छोड़   दीजिए   मानना,    होता   सब  संयोग।। आपा-धापी  दौर  में,    करिए   सतत   प्रयास - भोजन- सात्विक संग में, करो आप नित योग।।                                       मोदी  जी  ने  दे  दिया,   योग  विश्व  विस्तार।  कोशिश करने अब लगी, आज सभी सरकार।  नित  आगे  बढ़ता  रहे, सतत  योग अभियान -  योग  धर्म  से  जोड़कर, कभी न हो  तकरार।। ******* विविध  ******* गर्मी का मौसम कहे, खुद का रखिए ध्यान। जानबूझकर मत बनो, आप सभी नादान।। बनो  नहीं नादान तुम, रखो भाव में   नर्मी- बनना क्या मूरख भला, जो  होते अज्ञान।। खुद  को  ज्ञानी  मानना,   कैसे  होता  दोष। व्यर्थ आप दिखला रहे, मुझको अपना रोष। क्या  कापीराइट  भला, ज्ञान  आपके  नाम - अच्छा है जो स्वयं से, रखें  आत्म परितोष।। अपनी कौड़ी आप ही,  रखो  सदा  संभाल। नहीं  सभी के  सामने,  व्यर्थ बजाओ गाल। आज  लोग  कैसे  हुए,  जान  रहे  हैं  आप- फिर क्यों ऐसा सोचते, बहुत आपके ढाल।। दो कौड़ी का मानकर, मत करिए  उपहास। वही साथ होगा खड़ा, जिनसे छोड़ी आस।। यही समय का खेल है,  समझो प्यारे मित्र - भले  तुम्हारी  नजर में, वो खाता  है घास।। मेघा  आकर  छा  गए, बढ़ी  सभी  की  आस।  रिमझिम पड़े फुहार तब, हम सब खेलें तास।।  कहते प्रिय यमराज भी, सुनो  मित्र  की बात -  इतना  तुम  उछलो  नहीं,     रोते  बैठो  पास।। सारी  चिंता  छोड़  कर,     करिए  उत्तम कर्म। बिना किसी तकरार के, समझो  जीवन  मर्म।। कौन भला है कह रहा,  बन  जाओ  तुम  संत- पर इतना तो समझ लो, क्या  है  मानव धर्म।। मुक्तक लिखकर लोग कुछ, हो जातै हैं मुक्त। शब्द बँधन को तोड़कर, मन कर लेता सुक्त।   कागज़ पर जो उतरकर, बन  जाए  मुस्कान- पढ़ने  वाला  ही  सदा,  हो  जाता  है  सुक्त।। स्याही  सूखी  हो  भले, असर  नहीं  हो‌  लुप्त। दिल से जिसने पढ़ लिया, रहे नहीं वो  गुप्त।।  जिसको इसका  ज्ञान  है, वही  हुआ  धनवान -  कभी नहीं जीवन हुआ, उसका अपना  सुप्त।। आज खूब है बढ़ रहा,  निशिदिन ही अपराध। समझ  नहीं  है  आ  रहा, क्या  लेते  हैं  साध। मानव  की  सद्बुद्धि  पर, कैसा  माया-जाल- डर लगता हर ओर अब, हरो ईश अब व्याध।। जो भी जितना आजकल, करते हैं अपराध। उतने  ज्यादा  लोग ही,  उनसे   जाते  साध। परिवर्तन  के  दौर  में, यही  नया  गुरु मंत्र - दोषी  उनको  कह  रहे,  केवल हैं  एकाध।। ईश्वर  का  उपहार  है,   यह   जीवन   संसार। फिर भी हम कब मानते, भला कहाँ आभार।। समझ  नहीं  क्यों पा रहे, जीवन  का  उद्देश्य - बेवकूफ  हैं  लोग  सब,   समझें  इसे  उधार।। बैठे-ठाले   लोग   जो,    बनते   बड़े   महान। उतरे  बिना  मचान  से,     कैसे  भरें  उड़ान।। जिनके सिर पर दंभ का,  होता  भूत  सवार - ऐसे लोगों का अलग, अपना ग़ज़ब विधान।। आज  दिखावा  बन  रहे, अब  तो  फेरे  सात। हर दिन हम सब  देखते, होते  जो  प्रतिघात।। मामूली  सी  बात  पर,    हो  जाते  अब  खून- पति-पत्नी में अब कहाँ, वो पहले वाली बात।। रक्तदान  के नाम  पर, मुँह  लेते  हम  मोड़। भले एक दिन खुद हमें, पड़े लगानी दौड़।। मरती जाती संवेदना, यही आज का सत्य - स्वार्थ साधने को बने, हम  दानी  बेजोड़।। हम सबका होना चाहिए, बस जीवन का मंत्र। अपने रक्त का दान कर, भेदभाव  बिन  तंत्र।। जीवन के  दाता बनो, कर जन  का कल्याण - कभी  प्राण  के  नाम पर, करो नहीं  षड्यंत्र।। हँसी-हँसी में कह गए, बात  बड़ी  अनमोल।   जो समझे  वो तर  गए,  बाकी  पीटें  ढोल।। नहीं समझ में आ रहा, आज हास्य का खेल- फिर तो प्यारे बुद्धि से, तुम हो गोल मटोल।।  हास्य जगत के आज हैं, कविगण सब बेकार। भला  मित्र  यमराज  से,  कौन  करे तकरार।। लेना   हो   गुरुमंत्र  तो,  आओ   मेरे   पास - कल  पछताने  से  भला,  लेना आज उधार।। चमक  दमक  के  फेर  में, उलझे  सारे  लोग।   जाने क्यों नित बढ़ रहा, आज धरा यह रोग।। खान-पान  दिखला  रहा, चेहरों का  अब रंग- हर घर अरु परिवार सब, रोज  रहे  हैं  भोग।। घोटालों   का  बढ़  रहा,  रोज- रोज  ही  भाव।  जन-मानस भी मानता, सहना  हमको  घाव।। भेष  बदलकर  भेड़िए,     बन  जाते  बेईमान। भला करे सरकार क्या, दें अब आप  सुझाव।। पानी  भी  करने  लगा, अब  जमकर  उत्पात। जब जी  उसके आ रहा, करता  रहता  घात।। हम सब  भी  तो  कम  नहीं, करते  अत्याचार- जल जंगल अरु भूमि को, छेड़ रहे दिन-रात।। नीम  वृक्ष में  दिख  रहे, आज आम के बौर। यह मत कहना झूठ है,  बिना किए ही गौर।। भले  हमारी  बात  पर, आप करें  अब रोष-        क्या  सचमुच  आया  नहीं, चंदा चोरी दौर।। भले   हमारी   बात   पर,  नहीं  कीजिए   गौर। पर  समाज   दूषित  हुआ,   आया  ऐसा  दौर। व्यर्थ आप  हम हो रहे, सुबह - शाम  हलकान- नहीं किसी को अब रहा,  आज तरीका -तौर।। समझाना  ही  व्यर्थ  है,    नहीं  रुकेगा  शोर। कौन  मानता  बात  है,  रात  नहीं अब  भोर। यही  समय का  खेल  है, नहीं  पीटिए माथ-  शांत  भाव  से  देखिए, क्नाच  रहा  है  मोर।।      पानी  भी अब  आजकल, नहीं  पूछते   लोग। शहरों  का  जो  दृश्य  है,   बनता  भारी  रोग। जानें प्रभु श्री राम जी, कल क्या  होगा  हाल- यह तो बस शुरुआत है,  सीखो  पानी  योग।। जैसे-जैसे  हो  रहा,  सुविधा  का  विस्तार। वैसे होता  जा  रहा,  अब  निर्बल  आधार। समझ नहीं आता हमें, खोते क्या हम लोग - पीठ ठोंक निज कह रहे, दोषी है सरकार।। चाहे जितना कीजिए, आप सभी विस्तार। उससे  ज्यादा  चढ़  रहा, ढेरों  नया उधार।  नहीं समझ में आ रहा, कहता जो मैं बात- नस-नस में घुसपैठ का, पश्चिम है आधार।। क्षमता सबकी है अलग,  सभी  रहे  हैं  जान। फिर क्यों नाहक हो रहे,आप बहुत हलकान। जितनी क्षमता आपकी, उतना  करो  प्रयास- व्यर्थ  क्लेश  जो  पालते,    वे  होते  नादान।। पैसा ही अब तो रहा , रिश्तों का  आधार। इसके बिन कोई नहीं, सब लगते  बेकार। कहें मित्र यमराज जी, अजब कलयुगी रंग - मूरख हैं वे  लोग जो, नहीं  समझते  सार।। पन्ने-पन्ने में  लिखा, इक-इक  युग  का  सार। पढ़  लेता  है  जो  इसे,   मिले  श्रेष्ठ  आधार।  भवसागर  की  नाव  है,  अक्षर  का  आनंद-  पुस्तक पढ़िए मन लगा, जीवन आप सुधार।। आंदोलन  की  आड़ में, होते  नित नव  खेल। नाहक  ही  कुछ  लोग यूँ,  बन  जाते  हैं  रेल। निहित स्वार्थ के फेर में, लक्ष्य दिए सब छोड़ - अगुआ  जेबें  भर  चले,     बहे  गरीबा  तेल।। आंदोलन  की  आड़  में, होता  खूब  बवाल। नाहक जनता  बन रही, नेता की  जयमाल। कुर्सी-लालच  में पड़े, भूल  गए  सब  लक्ष्य- अगुआ निज  जेबें  भरें, जनता हुई कंगाल।। चोरी  भी  तो  कर्म  है,   इसमें   कैसा   पाप। जो  चोरी  लायक़  नहीं,  वही  करें  संताप।। कहें  मित्र  यमराज  जी,  गुरू  बनाओ  एक- फिर भी यदि भाए नहीं, तो भारी अभिशाप।। चंदा  चोरी  हो  रही,       कौन  बड़ी  ये  बात। अपने  भारत  के  लिए,  यह  भी  है  सौगात। नहीं  दुखी  हैं  राम  जी,    परेशान   सरकार- चाह रहे जन-मन सभी, हो इस पर प्रतिघात।। रिश्तों  में   अब  है   नहीं,   पहले  सा   विस्तार।  इसके   पीछे   स्वार्थ  का,     गहरा  है  आधार।  समय आधुनिक आज का, लिखे रोज इतिहास -  कोशिश   करके   देखिए,   शायद‌  ले  आकार।।                                             काकरोच  ने दे  दिया, एक  नया  आधार। नेता  सारे  देखते, क्या  विकल्प  विस्तार। लाभ भले कुछ ना मिले, पर होते सब तंग- इसीलिए  तो हो  रहा, रोज  नया तकरार।। पैसा  जिनके  पास  है, उनका  बढ़े  प्रभाव। देते  ऐसे  लोग  हैं,    कुछ  लोगों  को  घाव। नहीं  मानते  ये  कभी,  समय चाल की रीति- हो  सकता  कल में  पड़े, खाना  रोटी  पाव।। अब  तो पैसा  ही रहा, रिश्तों  का आधार। अपने भी अब लग रहे, इसके बिन बेकार। कहें मित्र यमराज जी, अजब कलयुगी रंग - मूरख हैं सब  लोग वे, नहीं  समझते  सार।। जीवन  में  संघर्ष  का,      निश्चित  है  स्थान। भले लोग माने नहीं, जिनको बहु अभिमान।। सबकी  अपनी  रागिनी,  गाते  राग  मल्हार - वे सब  देते मान हैं, जिनको  अनुभव  ज्ञान।। करते रहना  संघर्ष है, बिना  झुकाए  माथ। ईश्वर भी देता सदा,  हर मुश्किल में साथ।। नहीं आप बनिए खुदा, संग गणितिया खेल- आप साधना देखकर, थामें हाथ रघुनाथ।। अब  अपनों के  बीच भी, होता  बहु  संघर्ष। आपसे में कम हो गया, अपनों बीच विमर्श। समय चक्र  ऐसा  चले, भाई  दुश्मन  आज- इसीलिए तो अब लगे, व्यर्थ सभी उत्कर्ष।।      झंझावत में आजकल, फंसे हुए हम-आप। जाने कैसे झेलता,     मानव ये अभिशाप।। किस्मत ने कैसा बुना, इस जीवन का जाल- बस करना संतोष है, ये सब निज का पाप।।     जितना हुआ  विकास है, उतना  झंझावात। जैसे  दोनों  होड़ में, डाल-डाल  अरु  पात।। ईश्वर  जाने  कौन  सा,    दोनों  में  अनुबंध - समय  साथ  दोनों करें, दूजे  पर  प्रतिघात।।      द्वार खड़ी  बरसात का, स्वागत करिए आप।  भाईचारा   संग   में,      रहे    दूर    संताप।।  नहीं किसी को कष्ट हो, मिलकर करें विचार -   हमको करना है नहीं, सिर्फ स्वार्थ का जाप।।  इंतजार हम  कर रहे,  आ जाओ  बरसात।  दोनों  मिलकर  संग में, खूब  करेंगे  बात।। समझ तुझे आता नहीं, क्या मेरी मनुहार -  गुस्सा भी आता मुझे,  और संग आघात।। ईश्वर का धरि ध्यान जो, करता अपने काम।  उसके  हो जाते  सफल, सारे मन के काम।। श्रद्धा  अरु  विश्वास  में,  करते  ईश्वर  वास-  कभी नहीं  वो दास  को,  होने दें  बदनाम।। जब तक  मन से  हम नहीं, हो  सकते  तैयार।  तब तक कुछ भी कीजिए, होगा नहीं सुधार।। नहीं लाभ  कुछ आपको, करते  व्यर्थ  गुमान- समय  बिताने  से भला, करिए  नेक  विचार।। ********* रोला मुक्तक  ********** खोते  सारे  भाव, आज  बस  रुपया  दिखता। इसका पुण्य प्रताप, वहीं तक रिश्ता टिकता।। कहते  हैं  यमराज,   ग़ज़ब  है  रुपया  माया- इसके  आगे  आज,  मनुज है  मारा फिरता।। पुण्य-पाप  का फेर, नहीं कुछ  भी है होता। इसके  पीछे  राज,   बहाना  अपने  ढोता।। नीति-नियम सिद्धांत, राह जो चलता रहता- धर्म कर्म  की राह, चले वह  जगता-सोता।। पहले  चलना आप, पुण्य फिर  कल कर लेना। पहले  लेना  सीख,   बाद  में  कल  को  देना। कहें मित्र यमराज, कहाँ हो  अब तक  उलझे- पहले चलना  चाहिए,  आपका चना-चबेना।। कितना मिलता भाव,    पुण्य को हम सब जानें। आप   हमारी   बात,     भले   मानें   मत   मानें। कहें  मित्र  यमराज,     मनुज का  देखो लालच- अपना    देखे    लाभ,    सुनाते   अपने   गाने।। देखें बारिश राह, सभी  टकटकी लगाए। कैसे रोपें  धान, कृषक  रोते   मुरझाए।। इंद्रदेव जी आप, ध्यान  इतना बस  दीजै- रिश्वत  की यदि चाह, बताकर ही हर्षाएँ।। कहाँ छिपी  हो आप, बताओ  बरखा  रानी। बहुत हुआ अब खेल, नहीं करिए मनमानी।। निर्मोही  अब  शर्म, तनिक इतना तो कर ले- या फिर करें उपाय, लिखें फिर नई कहानी।। चहुँदिश  में  है  शोर,     गई  हो  चंदा  चोरी।  किया पाप घनघोर, व्यर्थ अब दाँत निपोरी।।  कहें  मित्र  यमराज, राम  जी  करते  लीला-  जितने  भी  हैं  चोर,  करें  वो  जोरा-जोरी।। सरयू  कहती  आज, दान अब  किसने लूटा।  नाम  राम  का  आज, कहाँ  पीछे  है  छूटा।।  कहें मित्र यमराज, प्रभो अब तो कुछ करिए-  या फिर  आकर आप, कहो  चोरी है झूठा।। राम  धाम  का  हाल, भक्त  को भक्तन लूटा।  लेखा  जोखा  झूठ,  पुण्य  श्रद्धा  का  टूटा। बोले   साधू   संत, गजब   है   देखो   लीला-  जिसने भी धन दान, उसे यम कब है कूटा।। सिंहासन   पर  बैठ,  राम  नाम   का  झूठा। चंदा   गए   डकार,  पाप  का   घंटा   फूटा। भक्त  रहे  हैं  पूछ, न्याय  है  क्या  ये  भाई-  जितने भी हैं पाप, कहाँ सिर उनका फूटा।। चंदा  चोरी  काम,    कौन   गिरशृंग   गिराया। हमने  थोड़ा  बोझ,  राम  जी  आप  उठाया। कहें  मित्र  यमराज,    मौन  हैं  राम  बेचारे - चीख रहे जो लोग, गये क्या सब सठियाया।। ******** सरसी छंद मुक्तक  ******** सीमा  से  बाहर  निकले  तो, मजा मिले भरपूर। अब ऐसा हमको लगता है, भव  बाधा सब दूर।। अच्छा लगता नहीं किसी को, पड़ता मुझे न फर्क कहते  रहिए  मिलकर  सारे, मैं  हूँ  मद  में चूर।। सारा  जग परिवार  हमारा, रखिए  इतना ध्यान। इसके  पीछे  छुपा  नहीं है, भेद   और   विज्ञान। सीधी-साधी बात भी जिसे, समझ नहीं है आता- उससे  बड़ा नहीं  है कोई, मान  जगत  अज्ञान।। ******* क्या पता कल आप हों,  हम न रहें। जो भी कहना आपको तत्क्षण कहें। मानिए   कहना   हमारा   मित्रवर- बेवजह  अब दर्द  इतना  मत  सहें।। अच्छा है हम दर्द जग का बाँट ले।  बेबसों लाचारों  को हम  साथ लें।  शौक बनने का खुदा हमको नहीं-  जो समय है शेष मिलकर काट लें।। सुधीर श्रीवास्तव  


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