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धन की सोच

धन की सोच

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हींग, धनिया, लौंग, मिर्च का, करता था कारोबार,

वो व्यापारी पहुंचा एक दिन इक ज्योतिष के द्वार।

कृपा करें कोई जगह बता दे, नदी वन हो या पहाड़,

जहाँ अनगिनत हींग मिर्च हो, दौलत के भंडार।


और ज्योतिष के कहे व्यापारी, सात समंदर पार ,

पहुँचा वन में जहाँ पड़े थे कंकड़ पत्थर हजार।

चमक रहे थे पत्थर सारे, जैसे झिलमिल तारे,

नहीं मिला थी चाहत जिसकी, धनिया,मिर्च, मसाले।


लौट के आया फिर पूछा जो करना था परिहास,

क्यों जगाई आशा झूठी और झूठा विश्वास?

हँस के बोला फिर ज्योतिष वो, सुनो हे व्यापारी,

सोच तुम्हारी बनी है दुश्मन, ये ही दुविधा सारी।


वो कंकड़ पत्थर नही थे भाई, हीरे मोती सारे,

दौलत के भंडार असीमित,दुर्लभ थे वो सितारे।

हींग, धनिया, लौंग ही केवल, नहीं दौलत के स्रोत,

ठगे गए तुम खुद से ही थी, गलत तुम्हारी सोच।


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