डिजिटल युग में पुस्तकों का भविष्य
डिजिटल युग में पुस्तकों का भविष्य
डिजिटल युग में पुस्तकों का भविष्य कल रात जब यमराज मुझे शुभरात्रि कहने आया तो मैंने डिजिटल युग में पुस्तकों के भविष्य वाला सवाल उसके सामने उठाया, बंदा खूँटा गाड़ कर बैठ गया और मुझसे ही पूछने लगा - आपको क्या लगता है? मैंने कहा - मुझे तो उज्ज्वल ही दिखता है। इतना सुन वह भड़क गया - खाक उज्ज्वल है? यह ठीक है कि डिजिटल युग ने आपको अनगिनत सुख-सुविधाएं तो दे रहा है, मगर उससे ज्यादा छीन भी तो रहा है। आदमी के पास अपने और अपनों के लिए समय बिल्कुल नहीं रह गया, आत्मीय संबंध औपचारिकता के शिकार हो रहे हैं संवेदनाएं बड़ी आसानी से मरती जा रही हैं, ऐसे में पुस्तकों का भाव भी अब कम होता जा रहा है पुस्तकों का चलन लगातार घटता जा रहा है उपलब्धता-अनुपलब्धता, सुविधा-असुविधा का तराजू मत उठाइएगा जनाब वास्तविकता में झाँकिए, फिर ज्ञान बाँटिए। आप हमारे मित्र हैं, बस इतना तक ही रहिए मुझे गुमराह कर अपनी औकात मत दिखाइए और मेरी बात ध्यान से सुनिए। आपका ये डिजिटल युग वर्तमान हो सकता है मगर भविष्य तो मुद्रित पुस्तकों का ही है, ठीक वैसे ही जैसे आपके पुरातन पंथी, अनपढ़ या कम पढ़े लिखे पुरखे आज भी आपको याद आते हैं, डिजिटल युग में पुराने रीति-रिवाज, परंपराएं आप सब भला क्यों नहीं छोड़ पाते हैं? बस! ऐसे ही आपके डिजिटल युगीन और मुद्रित पुस्तकों का असली भविष्य है। अच्छा है यमलोक में डिजिटल युग नहीं आया, वरना मेरा तो धरती से नाता ही टूट जाता, क्योंकि तब आत्माओं के आवागमन की सुविधा में डिजिटल तकनीक का अनाधिकृत प्रवेश हो जाता, और तब सबसे बड़ा दुर्भाग्य आपका होता, क्योंकि हम दोनों के मिलन का सौभाग्य भी सिर्फ आनलाइन ही हो पाता, क्योंकि तब आपसे आकर मिलने के चक्कर में मैं अपना समय ही क्यों बर्बाद करता। बस! प्रभु अब सोचो-सम़झो और आराम करो डिजिटल युग और उसके साथ अपना भविष्य देखो। फिलहाल मैं शुभरात्रि बोलकर विदा लेता हूँ, आपको आपकी डिजिटल दुनिया के हाथों में सौंपकर अपने धाम लौटता हूँ चिंता मत कीजिए, जल्दी ही फिर मिलता हूँ तब आपके डिजिटल युग में पुस्तकों के भविष्य पर लंबी बातचीत करता हूँ। सुधीर श्रीवास्तव
