चौपाई छंद -कुंदन
चौपाई छंद -कुंदन
चौपाई छंद - कुंदन तप की आँच सहन जो करता। नहीं किसी से है वो डरता।। मन के सारे मैल मिटाता। गीत स्वार्थ के कभी न गाता।। सारे दुख जो हँसकर झेले। बन कुंदन सम हर पल खेले।। राम-नाम कुंदन सम प्यारा। कट जाता भव बंधन सारा।। यह समाज की भट्टी भारी। बन कुंदन तपते नर-नारी।। निज चरित्र जो उज्ज्वल रखता। कुंदन हम वो सदा चमकता।। सच का है संकट से नाता। कुंदन कब किसको भरमाता।। दीन-दुखी की सेवा करना। कुंदन बनकर सदा चमकना।। भेदभाव से कैसा नाता। कुंदन खुद कब कहे विधाता।। जो भी पावन निर्मल रहता। ईश्वर नाम जाप वो करता।। सुधीर श्रीवास्तव
