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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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चौपाई छंद -कुंदन

चौपाई छंद -कुंदन

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चौपाई छंद - कुंदन तप की आँच सहन जो करता।  नहीं किसी से है वो डरता।। मन के सारे मैल मिटाता।  गीत स्वार्थ के कभी न गाता।।  सारे दुख जो हँसकर झेले। बन कुंदन सम हर पल खेले।। राम-नाम कुंदन सम प्यारा।  कट जाता भव बंधन सारा।। यह समाज की भट्टी भारी।  बन कुंदन तपते नर-नारी।।  निज चरित्र जो उज्ज्वल रखता।  कुंदन हम वो सदा चमकता।।  सच का है संकट से नाता।  कुंदन कब किसको भरमाता।।  दीन-दुखी की सेवा करना।  कुंदन बनकर सदा चमकना।।  भेदभाव  से  कैसा  नाता।  कुंदन खुद कब कहे विधाता।। जो भी पावन निर्मल रहता। ईश्वर नाम जाप वो करता।। सुधीर श्रीवास्तव 


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