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Ajay Singla

Inspirational

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Ajay Singla

Inspirational

चिन्ता

चिन्ता

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वर्षों पहले इस पृथ्वी पर 

जब कुछ ज़्यादा भोग नही थे 

इस धरा पर रहने वाले 

बहुत ज़्यादा लोग नही थे ।


रहते वृक्षों पर , गुफाओं में 

चिन्ता खा ले ना हिंसक जीव कोई 

भोजन मिलेगा या ना मिले 

चिंता तब इस बात की भी थी ।


फिर झूँड में रहने लगा और 

अन्न उगाकर वो खाने लगा 

परन्तु चिंता ने पीछा ना छोड़ा

सोच में कि कब होगी वर्षा ।


द्वेष दूजे झूँड़ों से भी कि

उनके पास ज़्यादा विषय सुख हैं 

लड़ने लगा उनसे इनके लिए 

यही सोच उसे दे रही दुःख है ।


जैसे जैसे सृष्टि आगे बढ़ी

चिंता मनुष्य की बढ़ती जाती 

इस सदी की तो बात ही क्या करें 

चिन्ताएँ समझ में ही ना आतीं ।


नगर बसे, राज्य बसाए 

धन कमाने लगा यत्न से 

अब चिंता कि चोर, डाकू या 

राजा सम्पत्ति ना छीन ले मुझसे ।


राजा को ये डर सता रहा 

पड़ोसी राजा आक्रमण ना कर दे 

उत्तराधिकारी भी कोई होना चाहिए

मेरे बाद जो सम्भाले सब ये ।


पिछले कुछ दशक की चिन्ताएँ कि

शिक्षा में प्रथम है आना 

परीक्षा में अंक ना कम आ जाएँ 

बाहर देश है पढ़ने जाना ।


अच्छी नौकरी की भी चिंता 

अच्छा जीवन साथी मिल जाए 

सन्तान हो जाए समय पर 

ना जाने कैसी कैसी चिन्ताएँ ।


बच्चों के भविष्य की चिंता 

चिंता फिर उनकी शादी की भी 

और बुढ़ापा जब आ जाएगा 

साथ में वो रहेंगे कि नहीं ।


कहीं रोग घेर ना ले कोई 

साथी मेरा साथ ना छोड़ दे 

सुख तो क्षण भर के लिए आता

नाता रहता है लम्बा दुःख से ।


जन्म लिया क्या इसीलिए कि

कोई ना कोई करते रहें चिंता 

चित व्याकुल हो सोच सोच के 

इससे छुटकारा होगा कभी क्या ।


दुःख में ना दुःखी, सुख में सुखी ना 

चाहता हूँ ऐसी अवस्था

हे प्रभु, कृपा करो मुझपर

कर दो तुम ही ऐसी व्यवस्था ।


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