चिन्ता
चिन्ता
वर्षों पहले इस पृथ्वी पर
जब कुछ ज़्यादा भोग नही थे
इस धरा पर रहने वाले
बहुत ज़्यादा लोग नही थे ।
रहते वृक्षों पर , गुफाओं में
चिन्ता खा ले ना हिंसक जीव कोई
भोजन मिलेगा या ना मिले
चिंता तब इस बात की भी थी ।
फिर झूँड में रहने लगा और
अन्न उगाकर वो खाने लगा
परन्तु चिंता ने पीछा ना छोड़ा
सोच में कि कब होगी वर्षा ।
द्वेष दूजे झूँड़ों से भी कि
उनके पास ज़्यादा विषय सुख हैं
लड़ने लगा उनसे इनके लिए
यही सोच उसे दे रही दुःख है ।
जैसे जैसे सृष्टि आगे बढ़ी
चिंता मनुष्य की बढ़ती जाती
इस सदी की तो बात ही क्या करें
चिन्ताएँ समझ में ही ना आतीं ।
नगर बसे, राज्य बसाए
धन कमाने लगा यत्न से
अब चिंता कि चोर, डाकू या
राजा सम्पत्ति ना छीन ले मुझसे ।
राजा को ये डर सता रहा
पड़ोसी राजा आक्रमण ना कर दे
उत्तराधिकारी भी कोई होना चाहिए
मेरे बाद जो सम्भाले सब ये ।
पिछले कुछ दशक की चिन्ताएँ कि
शिक्षा में प्रथम है आना
परीक्षा में अंक ना कम आ जाएँ
बाहर देश है पढ़ने जाना ।
अच्छी नौकरी की भी चिंता
अच्छा जीवन साथी मिल जाए
सन्तान हो जाए समय पर
ना जाने कैसी कैसी चिन्ताएँ ।
बच्चों के भविष्य की चिंता
चिंता फिर उनकी शादी की भी
और बुढ़ापा जब आ जाएगा
साथ में वो रहेंगे कि नहीं ।
कहीं रोग घेर ना ले कोई
साथी मेरा साथ ना छोड़ दे
सुख तो क्षण भर के लिए आता
नाता रहता है लम्बा दुःख से ।
जन्म लिया क्या इसीलिए कि
कोई ना कोई करते रहें चिंता
चित व्याकुल हो सोच सोच के
इससे छुटकारा होगा कभी क्या ।
दुःख में ना दुःखी, सुख में सुखी ना
चाहता हूँ ऐसी अवस्था
हे प्रभु, कृपा करो मुझपर
कर दो तुम ही ऐसी व्यवस्था ।
