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Sudhir Srivastava

Abstract

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Sudhir Srivastava

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चौपाई छंद

चौपाई छंद

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चौपाई छंद  सीख लिया है जग में जीना। मान ईश का मधुरस पीना।। व्यर्थ बहस क्यों समय गँवाना। ठाट-बाट क्या आप बनाना।। सबको यही सीख है देना। नाहक है कुछ देना-लेना।। जीवन की भी है मर्यादा। थोड़ा कम या थोड़ा ज्यादा।। हँसते गाते आगे बढ़ना। अपना परिचय खुद है गढ़ना।। राग-द्वेष सब भूल गये हैं। प्रेम प्यार सद्भाव नये हैं।। स्नेह भाव से सबको रहना। सुख-दुख आपस में है सहना।। नूतन राहें आप बनाई। करते अब अपनी भरपाई।। सीख लिया है विष को पीना। क्योंकि जीवन हमको जीना।। और भला हम क्या बतलाएँ। नहीं छुपा कुछ दाएँ-बाएँ।। सबसे पहले देश हमारा। पीछे उसके है जग सारा।। सबसे पहले हमें सुधरना। तभी किसी से कुछ हैं कहना।। जीवन मोल समझ में आया। सब अपने तब कौन पराया।। नव जीवन का सूत्र बनाया। सुखद भाव अब हृदय समाया।। सुधीर श्रीवास्तव 


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